सतगुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज बहुत महान सिद्ध संत और समाज सुधारक थे। उनका जन्म सिंध प्रांत में खंडु गांव में, सम्वत 1944 में आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि शनिवार, सन 1887 को हुआ था। सतगुरु स्वामी टेऊँराम जी के पिता का नाम श्री चेलाराम जी, माता का नाम श्री कृष्णा देवी था। बचपन से ही वे बहुत दयालु, शांत और धार्मिक स्वभाव के थे। उन्हें भगवान का भजन करना और लोगों की सेवा करना बहुत अच्छा लगता था। वे सभी लोगों को प्रेम, सत्य, दया और भाईचारे का संदेश देते थे। स्वामी जी कहते थे कि हमें हमेशा सच बोलना चाहिए, बड़ों का सम्मान करना चाहिए और गरीबों की मदद करनी चाहिए। उन्होंने लोगों को बुराइयों से दूर रहने की सीख दी। उन्होंने ने भक्तों को ॐ सतनाम साक्षी मंत्र दिया। जिसके जाप से मानव समाज मन की शांति को प्राप्त करता है। संदेश फैलाया गया, गुरुदेव ने लोगों में प्रेम और एकता का संदेश फैलाया। आज भी उनके बताए रास्ते पर चलकर बहुत लोग अच्छा जीवन जी रहे हैं। हमें भी स्वामी टेऊँराम जी महाराज के आदर्शों को अपनाकर अच्छे संस्कारों वाले बनना चाहिए।
सतगुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज का मन बचपन से ही भगवान की भक्ति और अच्छे सेवा कार्यों में लगता था। वे बहुत शांत, सरल और विनम्र स्वभाव के थे। उन्हें सभी लोगों से प्रेम करना और जरूरतमंदों की सहायता करना अच्छा लगता था। वे हमेशा सत्य बोलते थे और दूसरों को भी सच के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते थे।
स्वामी जी ने लोगों को प्रेम, भाईचारा, दया और सेवा का संदेश दिया। वे कहते थे कि सभी मनुष्य बराबर हैं और हमें कभी किसी से भेदभाव नहीं करना चाहिए। उन्होंने लोगों को नशा, झगड़ा, बुरी आदतों और अंधविश्वास से दूर रहने की सीख दी। वे चाहते थे कि सभी लोग मिल-जुलकर रहें और एक-दूसरे की मदद करें। उनके मुख से निकला सतनाम साक्षी का पवित्र संदेश आज भी लोगों को सच्चाई और अच्छे कर्म करने की प्रेरणा देता है।
स्वामी टेऊँराम जी महाराज गरीबों और दुखी लोगों की सहायता करते थे। वे बच्चों को अच्छे संस्कार देने पर बहुत जोर देते थे और माता पिता की सेवा आज्ञा पालन करना चाहिए! उनका कहना था कि बच्चों को बचपन से ही सत्य, ईमानदारी और बड़ों का सम्मान करना सीखना चाहिए। वे हमेशा सादा जीवन जीते थे और दूसरों को भी सादगी अपनाने की शिक्षा देते थे। उनके जीवन में प्रेम, त्याग और सेवा की भावना भरी हुई थी।
उन्होंने कई धार्मिक और सामाजिक कार्य किए तथा लोगों के जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास किया। आज भी उनके भक्त उनके बताए हुए मार्ग पर चलते हैं और अच्छे सेवा एवं परोपकार के कार्य करते हैं। स्वामी जी का जीवन हमें सिखाता है कि हमें हमेशा अच्छे कर्म करने चाहिए, भगवान का नाम लेना चाहिए और सभी से प्रेमपूर्वक व्यवहार करना चाहिए। हमें उनके आदर्शों को अपनाकर एक अच्छा और संस्कारी इंसान बनना चाहिए।
उन्होंने एक सन्त मण्डल की स्थापना की, जिसका नाम श्री प्रेम प्रकाश मण्डल रखा। एक बार सन्त मण्डली के साथ गुरु महाराज सिंध प्रान्त के नवाबशाह जिले के टण्डोआदम शहर के दक्षिण में घने जंगल में आकर रुके। इस घने जंगल में जगह-जगह रेत के टीले थे। वहीं पर अपनी संत मण्डली के साथ तन, मन से सेवा करके कुछ झोपड़ियों व सत्संग स्थान का निर्माण कर श्री अमरापुर स्थान की स्थापना की। यह स्थान डिब के नाम से प्रसिद्ध हुआ। जो कि आज भी श्री अमरापुर दरबार (डिब) के नाम से प्रसिद्ध है।
श्री अमरापुर स्थान के सम्बन्ध में आचार्य श्री का कथन है कि अब तो अमरापुर बनी, अद्भुत आलीशान! जौँका दर्शन करते ही, आनन्द होय महान !!
श्री अमरापुर स्थान के दर्शन और वहाँ सत्सग करने से मनुष्य की बुद्धि सत्कर्मों की ओर बढ़ती है और वह अमरत्व की ओर अग्रसर होता है। स्वामी श्री टेऊँराम जी कहते हैं कि धर्म ही जीवन की उन्नति और सद्गति का कारण है, इसलिए अपने धर्म को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। धर्म के लिए प्राण जाए तो भी धर्म से नहीं हटना चाहिए, धर्म अपने माही हरदम, प्यार कर नटना नहीं, शीश जाय जान दे, पर धर्म से हटना नहीं !!
यही आदर्श बताया गया है। स्वामी टेऊँराम जी के द्वारा श्री प्रेम प्रकाश ग्रन्थ की रचना की गई, जिसमें 800 पृष्ठ के अन्दर लगभग 1500 दोहे, 800 पद्य, 500 छन्द. 300 कविता, 60 शांति के दोहे, 16 शिक्षाएँ, 250 पद्य ब्रह्रादर्शनि, 2000 भजन, 108 सलोक माला आदि है।
प्रमुख रचनाएं (1) श्री प्रेम प्रकाश ग्रन्थ (2) दोहावली. (3) कवितावली छन्दावली (4) यमराज नचिकेता कथा (5) चुडाला शिखिरध्वज कथा (8) श्रुर्ति संवाद अमर कथा (7) सलोक माला माला (8) अमरापुरवाणी भजनमाला (हिन्दी एवं सिन्धी) (9) ब्रह्म दर्शनी, (10) वामन बली कथा, (11) साक्षी दर्शन इनकी प्रमुख रवनाएँ हैं।
संवत 1999 के पुरुषोत्तम मास की षष्ठी तिथि (सिन्धी चार तारीख) दिन शनिवार को 55 वर्ष की अल्पायु में अपनी लीला का संवरण करके आचार्य श्री स्वामी टेऊँराम जी महारज ने प्रेम प्रकाश आश्रम हैदराबाद (सिन्ध) में आसन मुद्रा में अपने नश्वर शरीर को छोड़ा। आचार्य श्री के बाद उनके परम शिष्य महर्षि सद्गुरू स्वामी सर्वानन्द जी महाराज ने विभाजन के बाद कई कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए इस परम्परा को आगे बढ़ाया। स्वामी सर्वानन्द जी ने प्रेम प्रकाश मण्डल को आगे बढ़ाते हुए श्री अमरापुर स्थान जयपुर, हरिद्वार और भारत में अनेक स्थानों पर आश्रमों की स्थापना की !
स्वामी सर्वानन्द जी महाराज के बाद तृतीय मण्डलाध्यक्ष प्रेमामूर्ति सद्गुरु स्वामी शान्ति प्रकाश जी महाराज, इनके बाद चतुर्थ मण्डलाध्यक्ष मर्यादामूर्ति सद्गुरु स्वामी हरिदास राम जी महाराज एवं वर्तमान प्रेम प्रकाश मंडलाध्यक्ष पूज्य स्वामी भगत्त प्रकाश जी महाराज हैं। भारतवर्ष सहित श्री प्रेम प्रकाश मंडल की लगभग देश- विदेश में कुल मिलाकर 150 से अधिक शाखाएं बनी हुई हैं। जहां नित्य नियम भजन, सत्संग, प्रार्थना , सेवा, सुमिरण, आरती आदि होती है। साथ ही अनेक सेवा कार्य जैसे राशन वितरण सेवा, अस्पताल, मेडिकल कैम्प दवाईयां आदि, बस्त्र दान, अन्न भोजन प्रसादम, हेल्थ कैम्प शिविर, रक्तदान शिविर, गौशाला, बाल संस्कार शिविर आदि सेवाएं चल रही है। धार्मिक गतिविधियों के साथ आर्थिक एवं सामाजिक सेवा कार्य भी निरंतर जारी हैं।
रामेश्वर धाम में सदगुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज घाट, सद्गुरू स्वामी सर्वानन्द जी महाराज घाट, सद्गुरू शान्ति प्रकाश जी महाराज घाट, सतगुरु हरिदासराम जी महाराज घाट आदि चार विशाल घाट लोगों की सुविधा हेतु श्री प्रेम प्रकाश मण्डल, श्री अमरापुर स्थान जयपुर द्वारा बनवाए गए हैं। हरिद्वार तीर्थ नगरी में भी अनेक घाट महाराज जी के नाम से बने हुए है !वर्तमान में प्रेम प्रकाश मण्डल का मुख्यालय श्री अमरापुर दरबार जयपुर में स्थित है जहाँ से सभी आश्रम संचालित है। जयपुर रेलवे स्टेशन से सिंधी कैम्प बस स्टैंड को जोड़ने वाली पुलिया श्री अमरापुर सेतु के नाम से बनी हुई है !
रेल मंत्रालय द्वारा भी एक ट्रेन का नाम श्री अमरापुर अरावली एक्सप्रेस रखा हुआ है ! विश्व प्रसिद्ध कैलेंडर पंचांगों में भी सदगुरु टेऊँराम जयंती को स्थान दिया गया है !
