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चैत्र मेला सिंधी बारहवीं तारीख को ही क्यों..? - अमरापुर दरबार

प्रेम प्रकाश मण्डल का, चैत्र मेला अभिराम ! संतजनों का दरस कर, पाओ आत्मराम !!

अखण्ड भारत देश ! अनोखा संत समागम ! कुम्भ सदृश विशाल चैत्र मेला ! भक्ति-भाव से ओत-प्रोत ! भजन – भोजन का भण्डारा… सत्संग गंगा में स्नान करने का सुअवसर… जीव का परमात्मा से मिलन… अध्यात्म ज्ञान चर्चा… नाम-दान-स्नान का त्रिवेणी संगम…

‘युगपुरुष सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज’ द्वारा स्थापित विश्व विख्यात चैत्र मेला! प्रेम प्रकाशियों का महाकुम्भ मेला! लघु काशी जयपुर गुलायी नगर की प्रमुख शान! ऐसा है प्रेम प्रकाश मण्डल का चैत्र मेला… एक समय टण्डा आदम में स्थित श्री अमरापुर दरबार (डिब) पर कुछ साधु संत-महात्मा एवं भक्तजन एकत्रित हुए। उन्होंने सद्‌गुरु महाराज जी को दण्डवत् प्रणाम किया और हाथ जोड़कर विनती करने लगे कि हे भगवन् ! आप तो सैलानी महापुरुष हैं… कभी कहाँ तो कभी कहाँ… जीवों के उद्धार हेतु यत्र-तत्र भ्रमण (विचरण) करते हैं… नाम दान का उपदेश देते हैं। जन-जन के हृदय में ज्ञान का दीप प्रज्जवलित कर रहे हैं! अंधकार में डूबे हुए जीवों को सत्मार्ग की राह दिखला रहे हैं। चल तीर्थ के समान सत्संग गंगा में स्नान करवा रहे हैं। अज्ञानता की नींद में सोये हुए लोगों को जगा रहे हैं। किन्तु श्री अमरापुर दरबार (डिब) पर अनेक संत महात्मा एवं श्रद्धालुगण दूर-दूर से आपके दर्शनों के लिये समय समय पर यहाँ आते ही रहते हैं। आप तो सदैव सैलानी हैं अर्थात् भ्रमण करते रहते हैं, और इस स्थान डिब पर आपका रहना बहुत कम समय के लिये ही होता है। इस कारण प्रेमी भक्तजन आपके दर्शनों से वंचित निराश होकर लौट जाते हैं। अतः आपश्री के पूज्य श्रीचरणों में प्रार्थना है कि ऐसे कुछ दिन निश्चित कर दीजिए, जिससे संत, भक्त प्रेमी आकर आपका दर्शन व सत्संग सुनकर अपना जीवन सफल बना सकें !

मिलो मिलाओ मिल रहो, मिलो तो मेला होय ! अन्तर आत्म जे मिले, मेला कहिये सोय !!

इस पर सद्गुरु महाराज जी ने सभी संत महात्मा, सत्संगी प्रेमियों को एक बैठक में प्रस्ताव देते हुए कहा- ‘इस डिब (बालू रेत का टीला) पर चैत्र मास की सिन्धी बारहवीं तारीख को रेत का चबूतरा और झोंपड़ियाँ बनाकर सत्संग का शुभारम्भ किया गया था। अतः चैत्र मास की सिन्धी बारह तारीख से लेकर सोलह तक पंच दिवसीय संत-महात्मा, भजन मण्डलियाँ, प्रेमी भक्तजन आदि सभी के लिये अखण्ड भजन-भोजन का समागम रखना चाहिए !’

सद्गुरु महाराज जी का यह सुझाव सभी संत-महात्माओं, भक्तजनों ने प्रसन्नचित्त होकर स्वीकार किया। चैत्र मास में बसन्त ऋतु होती है! रातें ठण्डी और सुहावनी होती हैं। गर्मी भी अधिक नहीं पड़ती। हिन्दू संस्कृति का नव वर्ष भी चैत्र मास से प्रारम्भ होता है। फसल कटाई होकर इस समय किसान भी फुर्सत में होते हैं (उस समय सिन्ध में अधिकांश लोग खेती-बाड़ी का कार्य ही करते थे) इसी मास में चेटीचण्ड, श्री रामनवमी, नवरात्रा, श्री हनुमान जयंती आदि पर्व-उत्सव मनाये जाते हैं। अतः इस मास में ‘मेला’ लगाना अति उत्तम होगा और इस मेले को ‘चैत्र मेला’ के नाम से जाना जाये !

इस पवित्र आध्यात्मिक चैत्र मेले में दूर-दूर के प्रेमी भक्तजन, संतों के श्रीमुख से सत्संग गंगा में स्नान कर लाभ उठा पायेंगे। इस प्रकार ‘चैत्र मास की बारहवीं तारीख’ को चैत्र मेला प्रतिवर्ष मनाये जाने का निश्चय हुआ। आज भी सिद्ध तपस्वी युगपुरुष सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज द्वारा स्थापित कुम्भ सदृश विशाल आध्यात्मिक ‘चैत्र मेला’ लघु काशी कही जाने वाली “गुलाबी नगरी जयपुर” के पावन तीर्थ स्थल श्री अमरापुर स्थान (डिब्) पर प्रतिवर्ष बड़ी भव्यता एवं श्रद्धा, भक्ति-भाव के साथ मनाया जाता है। जिसमें लाखों भक्त सत्संग, सेवा का लाभ लेते हैं। पाँच दिनों तक चलने वाले कुम्भ सदृश चैत्र मेले में युगपुरुष सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज का अखण्ड भजन व भोजन (भण्डारा) ‘लेने वाले बाबा देऊँराम-देने वाले बाबा देऊँराम’ उक्ति को चरितार्थ करता हुआ चलता है। इस अवसर पर असंख्य श्रद्धालुगण ज्ञानसरिता में डुबकी लगाकर अपने जीवन को धन्य-धन्य बनाते हैं!

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