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स्वामी सर्वानंद जी महाराज के जीवन चरित्र से: प्रसाद समझकर बनाए माताएं - बहने भोजन - अमरापुर दरबार

भोजन बनाने की भी विधि होती है, क्योंकि “जैसा अन्न वैसा मन” यह कहावत मिथ्या (झूठी) नहीं है। जो भोजन शुद्ध, शान्त, पवित्र, प्रसन्न मन और अपने हाथों से बनाया जाता है, वह भले ही रूखा-सूखा क्यों न हो पर अमृत का काम करता है! जो भोजन अशुद्ध, अपवित्र, अशान्त, अप्रसन्न मन से बनाया जाता है, वह भले ही चिकना-चुपड़ा, रसदार और स्वादिष्ट क्यों न हो पर ज़हर का काम करता है। यद्यपि भगवान श्री राम जी के पास दास-दासियों की कोई कमी नहीं थी, फिर भी माता सीता जी प्रभु श्री राम जी के लिए, स्वयं अपने हाथों से भोजन बनाती थी ! माता यशोदा के पास गोपियों की कोई कमी नहीं थी, फिर भी माता यशोदा स्वयं अपने हाथों से भोजन बनाती थी। नंदबाबा और यशोदा मैया काना को अपने हाथ का बनाया हुआ भोजन खिलाती थी!

माता ईश्वरी बाई भी भोजन बनाने से पहले मुंहं, हाथ-पैर धो-साफ कर फिर चौके (रसोई घर) में जाती थी, क्योंकि झूठे मुंहं भोजन बनाना पाप है। भोजन बनाते समय रसोई घर में खाना पीना नहीं चाहिये, क्योंकि भण्डारा झूठा-अपवित्र हो जाता है ! ये अन्नपूर्णा भगवान का अपमान है ! अन्न से जीवन और स्वास्थ्य शक्ति निकल जाती है ! भोजन बनाने से पहले और बाद में कच्चा अन्न और पक्का भोजन थोड़ा बहुत अग्नि में ज़रूर डालना चाहिये, ऐसा करने से अग्नि देव प्रसन्न होते है । क्रोध में भोजन कभी नहीं बनाना चाहिए ! सात्विक एवं पवित्र प्रसन्न मन से भोजन तैयार कर फिर सभी घर वालों को खिलाना चाहिये। सबके बाद भोजन बनाने वाले को खाना चाहिये। जैसे पाण्डव पत्नी द्रौपदी सबको खिला- पिलाकर फिर स्वयं भोजन करती थी। ऐसा करने से भण्डारा भरा हुआ एवं भरपूर रहता है। कहीं बाद में मेरे लिये भोजन न बचे, यह सोचकर दूसरों को खिलाये बिना अपने लिये भोजन निकालकर रखना या पहले खा लेना पाप है। अपने लिए पहले से निकाल कर रखना भी नहीं चाहिए !

माता ईश्वरी देवी सबको खिला-पिलाकर, पशु-पक्षियों को देकर फिर स्वयं भोजन करती थीं ।

रसोई घर में कुछ भी खाना, पीना नहीं चाहिए ! पवित्रता से भोजन बनाना चाहिए !!

इस लेख को माताएं बार बार पढ़ें और अपनी बेटियों को भी पढ़वाए !!! आज के समय में, ये शिक्षाएं देना बहुत जरूरी है !!!

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