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ॐ श्री सत्‌नाम साक्षी

महर्षि स्वामी सर्वानंद जी महाराज की पुण्य तिथि (महानिर्वाण दिवस) पर विशेष आलेख
18 अगस्त 2026 (मंगलवार)

आचार्य श्री सदगुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज के परम उपासक स्वामी सर्वानन्द जी महाराज

महापुरुषों की कही बातों व शिक्षाओं को लेखनी में बांधना बेहद कठिन होता है क्योंकि जो वाणी उनके श्रीमुख से निकलती है वह वेद का सूत्र बन जाती है. अगर कोई एक ही सूत्र को खोले तो एक किताब बन जाये। वह सूत्र सागर में सागर के समान होते है !

भारत देश की पावन धरा पर अनेक संतों-महापुरुषों का अवतरण हुआ है, सभी संतों-महापुरुषों ने न केवल भारत वासियों को सच्चा ज्ञान एवं सतत कर्मों का मार्ग दिखाया है, अपितु दुनिया के समस्त समुदायों को अपनी वाणी से मंत्रमुग्ध कर दिया, जिसका परिणाम है, आज भी देश-दुनिया के समुदाय इस पावन धरा व हमारे ऋषि-मुनियों, संतों- महात्माओं की तपःभूमि को नमन करते हैं!

इन्हीं संत-महापुरुषों की कड़ी में एक नाम आता है- त्याग तपस्या तपोभूमि की साक्षात् मूर्ति महर्षि योगीराज सद्गुरु स्वामी सर्वानन्द जी महाराज का ! जो अनन्त दैवीय गुणों से परिपूर्ण थे ! सच्चे गुरुभक्त स्वामी सर्वानन्द जी महाराज ने न केवल, अपने सद्गुरु महाराज, प्रेम प्रकाश पंथ के बीजक आचार्य सद्‌गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज की सेवा की वरन् उनके पावन उपदेशों की यशकीर्ति चहुँ ओर फैलाई एवं अपने सदुपदेशों से करोड़ों लोगों को सत्मार्ग की ओर अग्रसर किया.

महाराजश्री का शुभ अवतरण अविभाजित भारतवर्ष के सिन्धु प्रान्त में हैदराबाद जनपद की हाला तहसील के भिट्टशाह नामक गाँव में सम्वत् 1954 के मंगलमय आश्विन मास की शुक्ल चतुर्दशी (सिन्धी असू महीने की बारह तारीख), गुरु का गौरव बढ़ाने वाले पावन दिवस गुरुवार को प्रातःकाल माता ईश्वरी देवी व पिता सेवकराम जी के आँगन में हुआ! आपके ललाट पर अद्भुत तेज देखकर पिता सेवकराम ने ज्ञानी ब्राह्मणों को बुलवाया एवं आपके भविष्य के सम्बन्ध में पूछा. सभी वेदज्ञ पुरोहितों ने आपके तेजस्वी ललाट की दिव्य चमक देखकर भविष्यवाणी की कि “यह बालक बड़ा होकर महान संत बनेगा.” नामकरण संस्कार उत्सव में आपका नाम (सीरु) सर्वानन्द रखा गया। सिन्ध प्रदेश के सुविख्यात महायोगी तपस्वी संत सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज आपके मामा लगते थे, नामकरण संस्कार में वे भी सम्मिलित थे! आपने जब बालक सर्वानन्द के मस्तक पर हाथ फेरकर आशीर्वाद दिया तो बालक सर्वानन्द के चारों ओर विचित्र आभा मण्डल फैल गया, चेहरा ईश्वरीय शक्ति की दिव्य धारा से ओत प्रोत सा हो गया ! माता-पिता के घर प्रतिदिन संध्याकालीन सत्संग व आरती होती थी ! इससे बालक सर्वानन्द को बाल्यावस्था से ही सत्संगीय वातावरण सहज में ही प्राप्त हुआ ! जैसे-जैसे आप बड़े होते गये नित्य प्रार्थना व भजन माता-पिता व संगत के साथ गाने लगे. धीरे-धीरे आपका आध्यात्मिक ज्ञान बढ़ता गया ! किशोरावस्था के समय आपने संसार के मायाजाल से छुटकारा पाने का दृढ़ निश्चय ही कर लिया एवं माता-पिता की आज्ञा से युगपुरुष संत शिरोमणि सद्‌गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज की चरण-शरण में गये ! आचार्यश्री ने आपकी सेवा श्रद्धा ईश्वरीय लगन देखकर आपको शिष्य रूप में स्वीकार किया ! आपने अपने सद्गुरु महाराज की सेवा सुश्रूषा एकनिष्ठ होकर श्रद्धाभाव से की ! आचार्यश्री आपकी सेवा निष्ठा से बहुत प्रसन्न रहते थे! आपको संत मण्डली के साथ रटन पर भी ले जाते थे ! आचार्यश्री के अमरापुर धाम गमन के बाद संत मण्डल द्वारा श्री प्रेम प्रकाश मण्डल की बागडोर आपको सौंपी गई ! आपने पूर्ण निष्ठा से गुरु की कीर्ति को चहुं ओर फैलाया !

देश विभाजन की आशंका के चलते एक बार जब आचार्यश्री के साथ जयपुर में संत मण्डली का आगमन हुआ तो यहाँ पर स्वामी सर्वानन्द जी महाराज को अमरापुर दरबार की स्थापना के लिये गुरुदेव की रुचि संकेत हुआ. कालान्तर में देश विभाजन की त्रासदी के बाद आपके द्वारा जयपुर में आचार्यश्री के पावन मंदिर श्री अमरापुर दरबार (डिव) की स्थापना आचार्यश्री के संकल्प को ध्यान में रखते हुए उसी स्थान पर की गई. श्री अमरापुर स्थान की स्थापना की ! जहाँ आज हम सब लाखों भक्तों के साथ नित्य शीश झुकाकर उस परम पावन धरा श्री मन्दिर एवं समाधि स्थल को नमन-वन्दन करके मनोरथ पाते हैं !

सद्गुरु स्वामी सर्वानन्द जी महाराज जो शिक्षा सत्संग प्रवचनों में दिया करते थे, पहले स्वयं उस पर अमल करते थे. आपकी रहनी-सहनी विल्कुल सादगी से भरी थी, आप अपनी ओजस्वी वाणी में फरमाते थे कि सत्संग कल्पवृक्ष के समान है, जैसे कल्पवृक्ष की पूजा करने से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं, वैसे ही सत्संग से जीव को धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष चारों पदार्थ आसानी से मिल सकते हैं !

मोक्ष-ज्ञान व भक्ति विषय पर सद्गुरु स्वामी सर्वानन्द जी महाराज का कथन है कि कोई भी मनुष्य चाहे वह ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ अथवा संन्यासी क्यों न हो, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र किसी भी वर्ण का क्यों न हो, वह प्रयास करे तो गुरु कृपा से आत्मज्ञान को पाकर मोक्ष प्राप्त कर सकता है. ज्ञान व भक्ति का लक्ष्य परमात्मा है, परमात्मा का सम्बन्ध किसी जात पात से नहीं है, जो भी सत्य धर्म का पालन करते हुए भगवान का भजन-स्तुति करेगा ! वह मोक्ष निश्चित पायेगा !

अपने सद्गुरु टेऊँराम जी महाराज की दी हुई विद्या के बल पर आपने मन और इन्द्रियों को वश में रखकर शान्तचित्त रहकर, सभी दोषों से रहित होकर, परम्परा से प्राप्त गुरुमंत्र ‘सत्नाम साक्षी’ और प्रेम प्रकाश पंथ के नियमों का ज्यों का त्यों अक्षत: पालन किया! आपने सदैव आचार्यश्री को ही ईश्वरीय रूप में व्यापक माना, अपने सत्संग प्रवचनों में आप कहते हैं कि ज्ञान, वैराग्य, मोक्ष आदि सब कुछ गुरुदेव की कृपा से ही मिल सकते हैं! जो अंधकार से निकालकर प्रकाश में ले जावे, उसे ‘गुरु’ कहते हैं. सत्‌गुरु की आज्ञाओं के अनुकूल आचरण करना ही गुरुभक्ति कहलाती है एवं ‘गुरु-भक्ति’ को ही ‘हरि-भक्ति’ कहते हैं! आपने न केवल प्रेम प्रकाश पंथ की अपितु आचार्यश्री सदगुरु टेऊँराम जी महाराज की आभा व यशकीर्ति को चहुँ ओर फैलाया ! इसी के साथ देश-विदेश के अनेक नगरों में प्रेम प्रकाश आश्रमों की स्थापना की । आपकी तपोस्थली जयपुर व हरिद्वार के भव्य आश्रमों के साथ-साथ देश दुनिया में वर्तमान में संचालित आश्रम, जो प्रेम प्रकाश पंथ की आत्मज्ञान रूपी खुशबू से सभी को आनन्दित करके उनका पथ-प्रदर्शन कर रहे हैं!

आप सदैव सत्संग करने से पूर्व जिज्ञासुओं को सावधान व मन को एकाग्र करने को प्रेरित करते थे एवं सत्संग वर्खा के उपरांत सत्नाम साक्षी व साक्षी शिवोऽम् की धुनि लगाकर सत्संग को विराम देते थे !

‘यथा नाम तथा गुण’ की उक्ति को अपने नाम के साथ चरितार्थ किया. सर्व+आनन्द अर्थात् सभी को आनन्द देने वाले थे सद्‌गुरु सर्वानन्द ! देश विभाजन के पश्चात् आपने श्री प्रेम प्रकाश मण्डल का मुख्यालय जयपुर में श्री अमरापुर स्थान के नाम से स्थापित किया! यात्रा रटन के बाद आप अधिकांश समय जयपुर श्री गुरु दरबार श्री अमरापुर स्थान जयपुर (डिब) व हरिद्वार आश्रम पर ही निवास करते थे ! आपको गंगा मैया से विशेष लगाव था! वहाँ अनेक समय बैठकर भजन साधना करते थे !
महर्षि सदगुरु स्वामी सर्वानंद जी महाराज, सन 1977 गुरुवार के दिन इस पंच भौतिक शरीर का त्याग कर पारब्रह्म की ज्योति में समा गए ! उनके 49 वें पुण्य तिथि महानिर्वाण दिवस पर हम सभी पुष्पांजलि अर्पित करते है !

भगवद् स्वरूप महायोगी आचार्यश्री सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज के परम उपासक त्यागी, तपस्वी, महर्षि सद्‌गुरु स्वामी सर्वानन्दजी महाराज के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन-वन्दन !

🖋️ प्रेम प्रकाशी संत श्री मोहन लाल जी महाराज (संत मोनूराम जी)
श्री अमरापुर स्थान, जयपुर

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