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भक्ति के विशाल व्योम, प्रेममूर्ति आचार्य श्री 1008 सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज - अमरापुर दरबार

🕉️ ॐ श्री सत्नाम साक्षी 🕉️

ढाई अक्षर प्रेम में सब कुछ निहित है। सदियों से प्रेम की महिमा गाई गई है ! समय-समय पर सन्तों ने इस विषय की महत्ता स्थापित की है ! महाप्रभु चैतन्य, कबीर, रैदास, सूरदास, मीरा, गुरूनानक, तुलसीदास जी महाराज ने भक्ति रस का प्याला पिलाया है, उसी प्रकार सिन्ध प्रान्त में अवतरण लेकर हमारे इष्ट आराध्य सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज ने ‘प्रेम-प्रकाश ग्रंथ’ की रचना करके जन-जन को भक्ति रस से ओत-प्रोत कर दिया है! इस ग्रंथ में ब्रह्मदर्शनी, दोहावली, कवितावली, छन्दावली, पद, सलोकमाला, सोलह शिक्षाओं का अनूठा समावेश है ! इनमें छन्दावली में विविध विषयों पर गुरुदेव ने अपनी वाणी को श्रृंगारित किया है ! इनमें से एक विषय ‘प्रेम’ की महिमा को उजागर करता है !

प्रेम ही के वश प्रभु नाई बने सैन हित, प्रेम वश केवट से चरण धुलाया है ! प्रेम ही के वश प्रभु बेर खाये भीलनी के, प्रेम वश हरि शाक विदुर का खाया है ! प्रेम ही के वश प्रभु पार्थ का रथ हांका, प्रेम वश प्रभु यज्ञ-जूठन को उठाया है ! प्रेम ही के वश लीने तन्दुल सुदामा जी के, कह टेऊँ प्रेम इक प्रभु मन भाया है !

मानव जीवन की सफलता ‘प्रेम’ (प्रभु-प्रेम) में परिलक्षित होती है ! मन से प्रभु के प्रति समर्पण भाव ही सच्चा प्रेम है! जगत् के पदार्थों से प्रेम मिथ्या है ! प्रेम दूज के चांद की तरह होना चाहिए, जो उत्तरोत्तर बढ़ता ही रहे !

कहे टेऊँ हरि प्रेम की, महिमा है अधिकाय ! प्रेम भरे प्रवाह में, ज्ञान ध्यान बह जाय !!

यह जगत् भगवान की विचित्र लीलाओं का एक रंगमंच है. हम सामान्यजन यहाँ अपनी- अपनी भूमिका निभाते हैं और अभिनय समाप्त होने पर अदृश्य हो जाते हैं! किन्तु इसी बहुविध विविधताओं और द्वन्द्वों से आप्लावित निःसार संसार की सारता और परमोपयोगिता को सिद्ध करने के लिए समय-समय पर महाविभूतियों का अवतरण होता रहा है ! वे अपने जीवन से, कर्म से, व्यवहार से और ज्ञान से सांसारिक लोगों को, क्रिया प्रकृति की प्रत्येक वस्तु को प्रभावित करते हैं ! ऐसी ही एक महान, प्रातः स्मरणीय, वन्दनीय विभूति का इस पृथ्वी पर अवतरण सम्वत् 1944 को आषाढ़ शुक्ल की षष्ठी, दिन शनिवार को धर्ममयी माता कृष्णा देवी व पिता श्री चेलाराम के घर हुआ ! बचपन से ही आपको ईश्वर की भक्ति सम्बन्धी वातावरण प्राप्त हुआ. इसके फलस्वरूप आपने मात्र चौदह वर्ष की आयु में ‘गुरूदेव स्वामी आसुराम जी महाराज’ से गुरु दीक्षा प्राप्त की !

बालपन में उनका खेलने का ढंग भी निराला था ! साथियों को इकट्ठा करके आसन लगाते थे, फिर स्वयं आँखें बन्द करके अन्य को भी आंखे बन्द करने को कहकर राम नाम की धुन लगाते थे! कभी नदी के किनारे, तो कभी बाग-बगीचों में, कभी पीपल के नीचे, तो कभी शांत स्थान पर मित्र मंडली के साथ प्रभु-भक्ति में लीन हो जाते थे ! इकतारा लेकर जब स्वामी जी भजन गाते थे, तो नागरिकगण अपना-अपना कार्य छोड़कर स्वामी जी के भजन-रस में डूब जाते थे !

सद्गुरु महाराज जी का व्यक्तित्व महान था ! उसी का प्रतिबिम्ब कृतित्व में भी परिलक्षित होता था ! साधारण शब्दावली में गम्भीर दार्शनिक विषयों पर विवेचन अपने आप में विशेष है ! जीवन की क्षण भंगुरता का वर्णन करते हुए सद्‌गुरु जी लिखते हैं-

रैन गयी पुनि दिवस भया, दिवस गया भयी रात ! कहे टेऊँ मन चेत ले, आयु ऐसे जात !!

सत्संग की महिमा के संबंध में स्वामी जी का कथन है कि सत्संग रूपी वटवृक्ष को कोई भी तोड़ने में समर्थ नहीं है। सत्संग रूपी वृक्ष का आधार परब्रह्म-परमात्मा है, जो दिव्य है। जिसका प्रकाश सर्वत्र फैल रहा है। इसीलिए तन-मन-धन का अहंकार छोड़कर सत्पुरुषों की सेवा में रम जाओ! गुरु ही प्रभु से मिलाता है। भक्ति में ओत-प्रोत होकर ईश्वर के दिव्य-दर्शन कर सकते हैं। भक्ति के विशाल व्योम में महायोगी सद्‌गुरु श्री स्वामी टेऊँराम जी महाराज जैसे तेज पुँज मण्डित नक्षत्र का उदय हुआ और उन्होंने सत्संग की पावन मंदाकिनी से लौकिक दुःखों से पीड़ित जनों के सन्ताप नाश के परोपकारी कार्य का शुभारम्भ किया !

सद्‌गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज ने इसी लक्ष्य की सिद्धि के लिये एक संत मण्डल की स्थापना की, जिसका नाम ‘प्रेम प्रकाश मण्डल’ रखा गया !

स्वामी जी ने ‘सत्नाम साक्षी’ के परम पवित्र मंत्र से प्रेमियों को दीक्षित किया तथा इस मंत्र को आत्मसात करने का उपदेश दिया! स्वामी जी जात-पात, ऊँच नीच, अपना-पराया में भेद नहीं करते थे ! तहसीलदार वाहिद बख्श, रमजान, वकील भगवान दास और ब्राह्मण हुन्दलदास स्वामी जी के सम्पर्क में आए, तो उनके हृदय में परिवर्तन आ गया ! बीसवीं शताब्दी में सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज भक्ति युगीन सन्त समुदाय के प्रतिनिधि सन्त थे ! इनका समाज सुधार के प्रति व्यापक दृष्टिकोण और आध्यात्मिक ज्ञान की शिक्षा प्रदान करने की सहज प्रणाली आज भी जन-जन को उपकृत कर रही है! उनके द्वारा रचित सोलह शिक्षाएँ सदैव मार्गदर्शक के रूप में सहायक सिद्ध होंगी! वर्तमान में उनका पावन तीर्थ स्थल ‘श्री अमरापुर स्थान’ जयपुर में स्थित है ! इस स्थल पर भव्य श्री मन्दिर एवं समाधि स्थल भी बना हुआ है !

सद्‌गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज द्वारा रचित ग्रन्थावली श्री प्रेम प्रकाश ग्रन्थ (795 पृष्ठीय आध्यात्मिक महाग्रंथ), श्री प्रेम प्रकाश दोहावली (1375 दोहे), श्री ब्रह्मदर्शनी (250 ब्रह्म पद), श्री कवितावली-छन्दावली (पद-छन्द), श्री अमरापुर वाणी (हिन्दी-सिन्धी भजन संग्रह), सलोक माला (108 सलोक), सोलह शिक्षाएँ, शान्ति के दोहे, अमर कथा आदि अनुभवी वाणी का अमूल्य खजाना ‘महाराज श्री’ द्वारा रचित है ! जो कि श्री अमरापुर स्थान सहित सभी प्रेम प्रकाश आश्रमों में उपलब्ध हैं !

ऐसे युगपुरुष – युगदृष्टा कर्मयोगी को हमारा शत्- शत् नमन् ! श्री अमरापुर स्थान, जयपुर

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