भक्ति के विशाल व्योम और कर्म उपासक आचार्य श्री 1008 सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज
मनुष्य जन्म से नहीं अपितु कर्म से महान् बनता है ! जिसने अपने अन्तर्गत जाग्रति प्राप्त कर उस मूल तत्त्व को जान लिया, उन्होंने सब कुछ पा लिया ! यह जीव प्रेम, पुरुषार्थ, कर्मशील बनकर मन में सेवा भाव रखे तो शीघ्र ही परमात्मा को प्राप्त कर सकता है और सेवा से जीव अपना भाग्योदय करता है ! सेवा भी भक्तिका ही एक स्वरूप है !
श्री रामचरित मानस में वर्णित नवधा भक्ति को युगपुरुष सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज ने आत्मसात् कर जीवन में अपनाया स्वयं श्री गुरुदेव भगवान ने अपने सत्संग-प्रवचन में भक्ति के विषय पर ये कहा है-
श्रवण, स्मरण, कीर्तन, पद सेवन भगवान । अर्चन, वन्दन, दास्यरति, सख्य, समर्पण जान ।।
नवधा भक्ति में एक भी भक्ति निभाने वाला मोक्ष प्राप्त कर लेता है ! जैसे बलि ने समर्पण भक्ति कर मुक्ति प्राप्त कर ली ! सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज ने तो अनेक साधु संतों की संगत में भगवान के विभिन्न रूपों का श्रवण कर, प्रभु का सदैव स्मरण बाल्यावस्था से ही किया ! सखाओं, भक्तों को संग लेकर भगवान का कीर्तन किया ! भगवान के पद की सेवा, दास्य प्रेम, सखा के भाव रखकर उनकी अर्चना-वन्दना में अपना सब कुछ अर्पित कर दिया ! ऐसे भक्त सदैव अजर-अमर हो जाते हैं ! सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज का जन्म भक्ति-भाव रखने वाले माता-पिता (कृष्णादेवी-श्री चेलाराम) के घर (खण्डू गाँव, जिला हैदराबाद, सिन्ध) में विक्रम सम्वत् 1944 आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी शनिवार के दिन हुआ !
बचपन में ही एकांत में बैठकर बालमण्डली के साथ राम-नाम की धुनि लगाते थे ! ‘यकतारे’ को लेकर स्वरचित भजन विभिन्न राग- रागनियों में गाते हुए श्रोताओं को मंत्र-मुग्ध कर देते थे ! भक्त भी सांसारिक व्यवहारों, कार्यों को त्याग कर स्वामी जी के सत्संग में लीन हो जाते थे ! भक्ति सागर में भक्तजन गोते लगाते हुए परब्रह्म के साथ एकाकार हो जाते थे !
अज्ञानवश ही जीव स्वयं और भगवान में भेद करता है, द्वैतभाव रखता है ! आत्म ज्ञान प्राप्ति के बाद जीव ब्रह्म के साथ एकाकार हो जाता है, अद्वैत भाव धारण कर लेता है ! इसके लिए सत्संग और गुरू की आवश्यकता होती है ! कहा भी गया है-
सत्संग से सत्गुरु मिले, सत्गुरु से निज ज्ञान। कहे टेॐ निज ज्ञान से, मिलहिं पद निर्बान ।।
भक्ति के विशाल व्योम में “युगदृष्टा सद्गुरु श्री स्वामी टेऊँराम जी महाराज” जैसे तेज पुँज मंडित नक्षत्र का उदय हुआ और उन्होंने सत्संग की पावन मंदाकिनी में लौकिक दुःखों से पीड़ित लोगों के सन्ताप नाश के परोपकारी कार्य का शुभारम्भ किया ! सत्संग रूपी वटवृक्ष को काई भी तोड़ नहीं सकता ! सत्संग कल्पमतरु के समान है इसमें जो जैसा भाव रखता है उसे वैसा फल मिलता है !
“सत्संग निज कल्पतरु- सकल कामना देत”
इस कलिकाल में भवसागर को पार करने के लिए सत्संग और सेवा सबसे सरल एवं सुगम साधन है, जिससे सर्व दुःखों से छूटकर परमपद की प्राप्ति होती है !
कलियुग में प्रधान है सेवा पुनि सत्संग ! कहे टेऊँ जिसके किये, होवे भव दुःख भंग !!
सद्गुरु महाराज भक्ति के साथ-साथ कर्म प्रधान थे ! शुभ कर्मों के प्रणेता थे ! भक्तों को शुभ कर्म करने के लिए प्रेरित करने वाले थे ! सभी संतजन बुरे कर्मों से दूर रहने का उपदेश देते हैं ! पूर्व के शुभ कर्मों से मनुष्य देह मिली है, तो अभी शुभ कर्म करके मोक्ष प्राप्ति होगी ! मनुष्य को केवल कर्म करने चाहिए, फल की इच्छा नहीं रखनी चाहिए ! सद्गुरु महाराज जी कर्म में विश्वास रखते थे ! शुभ कर्म करने का संकल्प करते थे ! ‘सत्कर्म’ करने से पहले कर्म को समझना चाहिए-
श्री गुरुदेव भगवान ने समाज में ऊँच-नीच का भेद खत्म करते हुए स्वयं कुत्ते को उठाकर कर्मशील होने का परिचय दिया ! श्री अमरापुर दरबार के निर्माण के समय श्री गुरु महाराज जी स्वयं भगवान की सेवा समझ मिट्टी, रेत, बजरी आदि उठाकर सेवा किया करते थे ! इसी प्रकार सेवा उदारता का परिचय देकर एक सूरश्याम बालक के ऊपर कृपा कर उसे पारंगत केवल गवैया के नाम से प्रसिद्ध कर उसका जीवन सँवार दिया !
धर्म-कर्म ना छोड़िये, जब तक तन में श्वास । कह टेॐ करते रहो, धारे मन विश्वास ।।
जीवन पर्यन्त श्री गुरुदेव भगवान कर्मशील बने रहे ! वे कर्म करने में भी सेवा कर्म को अमृत-तुल्य मानते थे ! स्वयं साधु संतों, गरीबों, अनाथों, अतिथियों की सेवा करते थे ! समय-समय पर हम जीवों को संदेश देकर कहते थे कि माता-पिता, गुरु, अतिथि, गो-सेवा, आदि सेवा कर्म दुःख दूर करके सुख-समृद्धि प्रदान करता है! रामायण में आता है-
कर्म प्रधान विश्व कर राखा। जो जस करहिं सो तस फल चाखा ।।
चैत्र मेले के अवसर पर आश्रम में जगह-जगह कचरा-गंदगी होने पर ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्वयं साफ-सफाई कर अमाननीय सेवा का परिचय दिया ! कभी भी किसी के आगे हाथ न फैलाकर स्वयं मेहनत मजदूरी कर स्वयं बजाने हेतु वाद्ययंत्र ‘यकतारा’ खरीदा ! दोपहर के समय दर्शनार्थ आये अतिथियों को भोजन, जल एवं आवास देकर सुश्रूषा सेवा की ! ऐसी अनेक लीलाओं में कठोर कर्म व संकल्प शक्ति से 30-35 फुट ऊँचे रेत के टीले के ऊपर ‘श्री अमरापुर धाम’ की स्थापना कर असम्भव कार्य को सम्भव कर दिखलाया ! जीवन प्रसंगों के आधार पर हम कह सकते हैं- कथनी से अधिक करनी स्वामीजी में विद्यमान थी ! इन्हीं गुणों व कर्मशीलता के कारण पूज्य श्री गुरुदेव भगवान की यश-कीर्ति चहुँ और व्याप्त है !
सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज भक्ति और कर्म के अद्भुत उपासक थे ! वैदिक धर्म की रक्षार्थ ‘आचार्य श्री गुरुदेव टेऊँराम जी महाराज’ ने अपने साधना के बल अथवा भक्ति के प्रचण्ड प्रताप से एक नये निराले पंथ का शुभारम्भ किया ! इसी प्रकार चार आयाम स्थापित किए – प्रेम प्रकाश पंथ, श्री प्रेम प्रकाश ग्रंथ, सत्नाम साक्षी महामंत्र, और पावन तीर्थ श्री अमरापुर धाम का निर्माण, आदि का विश्व इतिहास में अमिट छाप छोड़ेगा !
1] महाराज श्री का पावन तीर्थ स्थल– महायोगी तपस्वी श्री सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज का पावन तीर्थ स्थल जयपुर में “श्री अमरापुर स्थान (डिब)” के नाम से सुविख्यात है ! इस स्थल पर भव्य श्री मंदिर, ग्रन्थ कक्ष, भगवान श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर, लडडू गोपाल जी, श्री अमरापुरेश्वर मंदिर, अमरापुर गौशाला, श्री अमरापुर यज्ञशाला, प्रदर्शनी स्थल (निवास स्थल) एवं “पवित्र समाधि स्थल” बने हुए हैं ! आज प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु इस प्रवित्र तीर्थ स्थल के दर्शन करके अपने जीवन को धन्य धन्य बनाते हैं !
2] सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज द्वारा रचित ग्रंथावली – श्री प्रेम प्रकाश ग्रंथ (795 पृष्ठीय आध्यात्मिक महाग्रंथ), श्री प्रेम प्रकाश दोहावली (1375 दोहे), श्री ब्रद्मदर्शनी (250 ब्रद्म पद), श्री कवितावली – छन्दावली (पद – छन्द), श्री अमरापुर वाणी (हिन्दी – सिन्धी भजन संग्रह), सलोक माला (108 सलोक), सोलह शिक्षाएं, शान्ति के दोहे, अमर कथा आदि अनुभवी वाणी का अमूल्य खजाना “महाराज श्री” द्वारा रचित है !
3] “महाराज श्री” के नाम की कुछ पावन स्मृतियां– जयपुर में विशाल सद्गुरु टेऊँराम गोशाला, उज्जैन में सद्गुरु टेऊँराम घाट, रामेश्वर धाम में सद्गुरु टेऊँराम घाट (अग्नितीर्थम), हरिद्वार में सतनाम साक्षी घाट, श्री अमरापुर घाट, श्री प्रेम प्रकाश घाट, सद्गुरु टेऊँराम चौक (भीमगोडा), अमरापुर अरावली एक्सप्रेस ट्रेन का नाम आदि इसी के साथ सदगुरु टेऊँराम उद्यान, स्वामी टेऊँराम विद्यालय, सर्किल, सदगुरु टेऊँराम चौक, पथ, सदगुरु टेऊँराम मार्ग, सदगुरु टेऊँराम अस्पताल, ऐसे ही अनेक स्थान विभिन्न शहरों में बने हुए है ! साथ ही “महाराज श्री” के नाम से अनेक सेवा कार्य हॉस्पिटल, सदगुरु टेऊँराम गौशाला, सेवा केन्द्र, शव वाहन, एम्बुलेंस, मोचुरीबॉक्स, श्री अमरापुर अन्नक्षेत्र जल एवं प्रसाद वितरण आदि ! विश्व के प्रसिद्ध जाने माने कैलेण्डरों व पंचांगो में “सद्गुरु टेऊँराम जयन्ती” को स्थान मिला है !
4] महापुरुष कर्मयोगी आचार्य श्री सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज के 55 वर्ष तक इस कलिकाल में सनातन धर्म का प्रचार – प्रसार कर अपनी जीवन लीला समेट कर संवत 1999 पुरुषोत्तम सिंधी तारीख 4, दिन शनिवार प्रातः काल ब्रह्म मुहुर्त में आसान मुद्रा में अपने पांच भौतिक देह का विसर्जन किया | उनकी आत्म ज्योति परब्रह्म की महा ज्योति में समा गई | उनका दिव्य आलोक आज भी पूरे विश्व में अनंत जीवों का मार्ग दर्शन कर रहा है !!!!
