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19 जुलाई (रविवार)
सदगुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज की 140 वीं जयंती पर विशेष आलेख
समाज सुधारक, मानवता के उपासक कर्मयोगी युगपुरुष
आचार्य सदगुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज
प्रेम प्रकाश पंथ के संस्थापक
आचार्याधीश ब्रह्मलीन सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज
भारतवर्ष आदि काल से ही संतों, ऋषियों और महापुरुषों की पुण्यभूमि रहा है। इस पावन धरा पर समय-समय पर ऐसे दिव्य आत्माओं का अवतरण होता रहा है, जिन्होंने अपने तप, त्याग, ज्ञान और प्रेम से मानवता का मार्ग प्रशस्त किया। भारतीय संस्कृति की महान परंपरा में संतों का स्थान सदैव सर्वोच्च रहा है, क्योंकि वे केवल धर्म के उपदेशक ही नहीं, अपितु समाज के सच्चे पथप्रदर्शक और लोकमंगल के प्रेरक होते हैं।
जब भारत का विभाजन हुआ और सिंध प्रदेश का एक भाग पाकिस्तान में चला गया, उसी पुण्यभूमि सिंध में एक ऐसे महान संत का अवतरण हुआ, जिन्होंने प्रेम, सेवा और अध्यात्म का ऐसा दीप प्रज्वलित किया जिसकी ज्योति आज भी असंख्य हृदयों को आलोकित कर रही है। वे थे – परमाचार्य, प्रेम प्रकाश मंडल के संस्थापक, ब्रह्मलीन आचार्य श्री १००८ सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज।
पूज्य स्वामी श्री टेऊँराम जी महाराज केवल एक संत ही नहीं थे, बल्कि वे एक युगद्रष्टा, समाज-सुधारक, आध्यात्मिक मार्गदर्शक और सच्चे सद्गुरु थे। उन्होंने भगवत् प्रेम का ऐसा दिव्य प्रकाश फैलाया जो केवल भारत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि देश-विदेश में भी असंख्य लोगों के जीवन को आलोकित करता गया। उनके प्रेममय व्यक्तित्व का दर्शन करने वाला प्रत्येक व्यक्ति भक्ति और आनंद के रस में सराबोर हो जाता था।
संत महापुरुषों की महिमा
संत महापुरुषों की महिमा का वर्णन स्वयं भगवान भी करते हैं। श्रीमद्भागवत में भगवान कहते हैं—
साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं त्वहम्।
मदन्यत्ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि॥
अर्थात् साधु मेरा हृदय है और मैं साधु का हृदय हूँ। मेरा साधु मेरे अतिरिक्त किसी को नहीं जानता और मैं भी अपने साधु के अतिरिक्त किसी को नहीं जानता। यह कथन संतों की परम अवस्था का परिचायक है। सच्चे संत ब्रह्मद्रष्टा होते हैं। वे प्रत्येक जीव में परमात्मा का दर्शन करते हैं और अपना सम्पूर्ण जीवन जगत के कल्याण के लिए समर्पित कर देते हैं।
सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज भी ऐसे ही करुणा और दया के सागर थे। उन्होंने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण मानवता की सेवा, समाज के उत्थान और जीवों के आध्यात्मिक कल्याण के लिए अर्पित कर दिया। उनके उपदेशों का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को नश्वर संसार की मोह-माया से निकालकर अमर आत्मस्वरूप की ओर ले जाना था।
संसार की क्षणभंगुरता
स्वामी जी अपनी वाणी में संसार की क्षणभंगुरता का बोध कराते हुए कहते हैं—
धन दौलत तो दूर है, साथ न चालत देह।
टेऊँ निकसे प्राण के, जलत चिता में एह॥
इस दोहे में महापुरुष मानव को जागृत करते हुए कहते हैं कि जिस धन-दौलत और वैभव पर मनुष्य इतना अभिमान करता है, वह तो दूर की बात है, उसका अपना शरीर भी अंत समय में उसका साथ नहीं देता। प्राण निकल जाने के बाद यही शरीर चिता की अग्नि में भस्म हो जाता है। इसलिए मनुष्य को अपने वास्तविक स्वरूप, अर्थात् आत्मतत्त्व की पहचान करनी चाहिए। संसार के समस्त भौतिक संबंध अस्थायी हैं; हमारा शाश्वत और वास्तविक संबंध केवल परमात्मा से है।
आशा, तृष्णा और ईर्ष्या
सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज आगे मानव जीवन की एक अन्य बड़ी समस्या की ओर संकेत करते हुए फरमाते हैं—
आशा, तृष्णा, ईर्ष्या, चौथी चिंता आग।
टेऊँ इस से जलत सब, बाचे को बड़भाग॥
महापुरुष कहते हैं कि आशा, तृष्णा, ईर्ष्या और चिंता ऐसी अग्नियाँ हैं जिनमें सम्पूर्ण संसार जल रहा है। इन मानसिक विकारों से बच पाना अत्यंत दुर्लभ है। केवल वही मनुष्य वास्तव में भाग्यशाली है जिसे सच्चे सद्गुरु की शरण प्राप्त हो जाती है। सद्गुरु ही अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश प्रदान करते हैं।
स्वामी टेऊँराम जी महाराज ने अपने उपदेशों द्वारा मानव को समझाया कि संसार में स्थायी सुख की प्राप्ति संभव नहीं है। धन, पद, प्रतिष्ठा और भौतिक वस्तुओं की तृष्णा कभी समाप्त नहीं होती। यदि आशा रखनी है तो भगवान की प्राप्ति की आशा रखो, यदि तृष्णा करनी है तो प्रभु-भक्ति की तृष्णा करो। ईर्ष्या का कोई स्थान नहीं होना चाहिए, क्योंकि प्रत्येक जीव में वही परमात्मा विद्यमान है। जब सबमें एक ही ईश्वर का वास है, तब द्वेष और भेदभाव का प्रश्न ही नहीं उठता।
प्रेम प्रकाश पंथ का उद्देश्य
सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज द्वारा स्थापित प्रेम प्रकाश मंडल का मूल उद्देश्य भी यही था कि प्रत्येक हृदय में प्रेम का प्रकाश प्रज्वलित हो और मानव समाज जाति, धर्म, भाषा और प्रांत के संकीर्ण भेदों से ऊपर उठकर आत्मीयता एवं भाईचारे का जीवन जी सके। उन्होंने प्रेम को ही धर्म का सार माना और प्रेम को ही ईश्वर प्राप्ति का सहज मार्ग बताया।
उनकी आध्यात्मिक वाणी दोहे, पद, छंद, भजन और कवित्तों के माध्यम से जन-जन तक पहुँची। उनकी वाणी में ईश्वर-प्राप्ति, कर्म-उपासना, वैराग्य, सदाचार, सेवा, भक्ति और आत्मज्ञान का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। उन्होंने जनमानस को सकारात्मक जीवन दृष्टि प्रदान करते हुए धर्म को व्यवहारिक जीवन से जोड़ा।
सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज की अमूल्य आध्यात्मिक वाणी का विशाल संकलन लगभग ८०० पृष्ठों के महान ग्रंथ ‘प्रेम प्रकाश’ के रूप में उपलब्ध है। यह ग्रंथ केवल एक धार्मिक पुस्तक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ज्ञान, भक्ति और जीवन-दर्शन का अनुपम भंडार है। इसमें निहित शिक्षाएँ आज भी साधकों के लिए मार्गदर्शक दीपक का कार्य करती हैं।
आज देश और विदेश में जहाँ-जहाँ प्रेम प्रकाश मंडल की शाखाएँ एवं आश्रम स्थापित हैं, वहाँ सद्गुरु द्वारा प्रतिपादित आदर्शों के अनुरूप संत सेवा, अतिथि सेवा, गौ सेवा, शिक्षा सेवा, मानव सेवा तथा समाज कल्याण के विविध कार्य निरंतर संचालित हो रहे हैं। इन सेवाकार्यों को देखकर सहज ही अनुभव होता है कि सद्गुरु की शिक्षाएँ आज भी जीवंत हैं और समाज को दिशा प्रदान कर रही हैं।
वास्तव में सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज का सम्पूर्ण जीवन प्रेम, सेवा, त्याग, भक्ति और मानवता का उज्ज्वल उदाहरण है। उन्होंने अपने दिव्य जीवन द्वारा यह सिद्ध किया कि सच्चा संत वही है जो स्वयं प्रकाशमान होकर दूसरों के जीवन को भी आलोकित करे।
ऐसे महान युगपुरुष, परम संत, प्रेमावतार, समाज-सुधारक एवं मानवता के उपासक कर्मयोगी सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज के श्रीचरणों में हमारा कोटि-कोटि प्रणाम, बारम्बार वंदन और श्रद्धापूर्ण नमन।
🖊️ प्रेम प्रकाशी संत मोहन लाल जी महाराज
श्री अमरापुर स्थान, जयपुर
