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गुरु महिमा: सद्‌गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज द्वारा रचित - अमरापुर दरबार

1008 आचार्य सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज अपनी अनुभव अमृतमयी वाणी प्रेम प्रकाश ग्रंथ की दोहावली भाग में गुरु महिमा को प्रतिपादित करते हुए कहते हैं:

गुरु को कर तुम वंदना, श्रद्धा मन में धार । कह टेऊँ इस जगत में, पाय पदार्थ चार ।।

जो व्यक्ति अपने मन में श्रद्धा रखकर गुरु का वंदन (सम्मान) करता है, उनकी सेवा करता है — वह इस संसार के चार पुरुषार्थ: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को सहजता से प्राप्त कर लेता है। गुरु की भक्ति से जीवन के सभी लक्ष्यों की पूर्ति संभव हो जाती है।

गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु, है गुरु शेष महेश । कह टेऊँ गुरु सूर्य शशि, है गुरु गौरी गणेश ।।

गुरु की महिमा बताते हुए आचार्य टेऊँराम जी कहते हैं कि जब शिष्य पूर्ण निष्ठा के साथ गुरु भक्ति करता है, तब गुरु कभी ब्रह्मा बनकर सृष्टि का ज्ञान देते हैं, कभी विष्णु बनकर पालन करते हैं, कभी महेश (शिव) बनकर विनाशकारी दोषों को हरते हैं। वे सूर्य बनकर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं, चंद्र बनकर शीतलता देते हैं और गौरी-गणेश स्वरूप बनकर भक्त के समस्त दुखों का नाश करते हैं।

ध्यान मूल गुरु मूरती, पूजा मूल गुरु पाद। मंत्र मूल गुरु वचन है, मुक्त्ति गुरु प्रसाद।।

सच्चा साधक ध्यान में गुरु के दिव्य स्वरूप को रखता है, पूजा में उनके चरणों को वंदन करता है और अपने जीवन में गुरु के वचनों को ही मंत्र मानता है। इस प्रकार की गुरु श्रद्धा रखने वाला शिष्य, गुरु की कृपा से मुक्ति रूपी फल को प्राप्त कर लेता है। यही रहस्य है।

गुरु भक्ति से हीन जो, पढ़ता वेद पुरान । कह टेऊँ सिंह सफल नहीं, कर्म धर्म इस्नान ।।

जो मनुष्य वेद, पुराण, ग्रन्थ आदि नित्य पढ़ता हो, कर्म और धर्म के अनुसार जीवन यापन करता हो, तीर्थों में जाकर इस्नान करता हो — परंतु यदि वह गुरु भक्ति नहीं करता, तो उसके सारे धार्मिक कार्य निष्फल हो जाते हैं। आचार्य जी कहते हैं कि केवल गुरु भक्ति और सेवा ही उन कर्मों को सार्थक बना सकती है।

कह टेऊँ संसार में, गुरु जैसा नहीं मीत। और मित्र सब स्वार्थी, बिन स्वार्थ गुरु नीत।।

आचार्य जी कहते हैं कि इस संसार में गुरु से बड़ा कोई सच्चा मित्र नहीं है। सांसारिक मित्र किसी न किसी स्वार्थ से संबंध रखते हैं, परंतु गुरु पूर्णतः निःस्वार्थ होता है। वह शिष्य के कल्याण के लिए ही कार्य करता है। गुरु की मित्रता आत्मा के हित में होती है, न कि शरीर या भौतिक लाभ के लिए।

चिंतामणि गुरुदेव है, तांको सेवे जोय। दुख दरिद्रता दूर कर, सुख पावे जन सोय।।

गुरुदेव को ‘चिंतामणि’ — अर्थात् इच्छापूर्ति रत्न कहा गया है। जो भी व्यक्ति सच्चे भाव से गुरु की सेवा करता है, वह अपने जीवन के सभी दुखों और दरिद्रता से मुक्त हो जाता है और स्थायी सुख की प्राप्ति करता है। गुरु की सेवा ही हर पीड़ा का समाधान है।

दीपक ले गुरु ज्ञान का, अविद्या तम कर दूर। कह टेऊँ प्रत्यक्ष लखो, जो सब घट भरपूर।।

गुरु ज्ञानरूपी दीपक देते हैं, जिससे अज्ञानता का अंधकार समाप्त हो जाता है। आचार्य जी कहते हैं कि यह प्रभाव प्रत्यक्ष देखा जा सकता है — गुरु का प्रकाश प्रत्येक जीव के भीतर व्याप्त होता है। जो गुरु के ज्ञान से जुड़ता है, वह स्पष्ट रूप से आत्मप्रकाश देखता है।

ब्रह्म निष्ठ ब्रह्म श्रोत्री, सदाचार युत होय। कह टेऊँ शिष्य हित चहे, सत्गुरु कहिये सोय।।

जो व्यक्ति ब्रह्म में स्थित हो, वेदों का ज्ञाता हो, सदाचारी हो और शिष्य के हित की भावना रखे — वही सच्चा सतगुरु होता है। गुरु का उद्देश्य केवल शिष्य के कल्याण में होना चाहिए, तभी वह सतगुरु कहलाता है।

राग द्वेष जिसको नहीं, काम क्रोध अहंकार। सतगुरु सो पहचानिये, कह टेऊँ निर्धार।।

जिस गुरु के भीतर राग-द्वेष, काम, क्रोध और अहंकार न हो, वही सच्चा सतगुरु है। आचार्य जी कहते हैं कि ऐसे गुरु की पहचान स्पष्ट है — वे निर्लिप्त, शांत और दिव्य होते हैं।

क्या गृही पुनि विरक्त क्या, ब्रहाज्ञान जिहें होय। कह टेऊँ सत् बोध दे, सत्गुरु कहिये सोय।।

गुरु गृहस्थ हो या सन्यासी, यदि उसमें ब्रह्मज्ञान है और वह शिष्य को सत्य का बोध कराने में सक्षम है, तो वह सतगुरु कहलाने योग्य है। स्थिति नहीं, चेतना महत्त्वपूर्ण है।

सुरति लगे गुरु शब्द जिस, मन गुरु मूरत माहिं। कह टेऊँ कब ना लगे, यमपुर का दुख ताहिं।।

जिस शिष्य की चेतना गुरु के शब्दों में लगी हो और मन गुरु के रूप में रमा हो — वह यमराज के दुखों से सदा सुरक्षित रहता है। गुरु की भक्ति उसे मृत्यु के भय से भी मुक्त कर देती है।

सत्संग से सत्गुरू मिले, सत्गुरू से निज ज्ञान ! कह टेऊँ निज ज्ञान से, मिलहै पद निर्बान !!

सत्संग के माध्यम से सतगुरु की प्राप्ति होती है, सतगुरु से आत्मज्ञान और आत्मज्ञान से मोक्ष प्राप्त होता है। यह मुक्ति की श्रृंखला है।

सत्गुरू बुद्धि के नैन में, डारे अंजन ज्ञान ! कह टेऊँ तम भ्रम हर, दिखलावे भगवान !!

सतगुरु बुद्धि रूपी आंखों में ज्ञान रूपी अंजन (काजल) लगाते हैं, जिससे अज्ञान रूपी अंधकार दूर होता है और आत्मा को भगवान के साक्षात दर्शन होते हैं।

कह टेऊँ भगवान से, सत्गुरू अधिक पछान ! कर्मों का फल देत हरि, गुरू दे मुक्ति दान !!

भगवान केवल कर्मों का फल देते हैं, परंतु सतगुरु मोक्ष का वरदान देते हैं। इसलिए आचार्य जी कहते हैं — सतगुरु की पहचान भगवान से भी बढ़कर है।

गुरू बिन रंग न लागहीं, गुरू बिन ज्ञान न होय ! कह टेऊँ सत्गुरू बिना, मुक्ती न पावे कोय !!

गुरु के बिना सच्चा प्रेम, भक्ति और आत्मज्ञान संभव नहीं। सतगुरु के बिना कोई भी आत्मा मुक्ति को प्राप्त नहीं कर सकती।

पूरन सत्गुरू देव से, पूरन ले उपदेश ! कह टेऊँ तिहं सुमर के, पाओ पूरन देश !!

जो शिष्य पूर्ण सतगुरु से सम्पूर्ण उपदेश लेकर सच्चे मन से स्मरण करता है, वह अंततः पूर्ण परमधाम (मोक्ष) को प्राप्त करता है।

सतगुरु मुझको दान दे, प्रेम भक्ति विश्वास ! कह टेऊँ नित सुमति दे, सन्तन माहिं निवास !!

हे सतगुरु! मुझे प्रेम, भक्ति और विश्वास का वरदान दीजिए। मुझे सदैव शुभ बुद्धि दीजिए और संतों की संगति में बनाए रखिए।

सतगुरु तुम पूरण करो, मेरी यह अर्दास ! कह टेऊँ मन में कभी, रहे न जग की आस !!

हे पूरण सतगुरु! मेरी यह प्रार्थना स्वीकार करें कि मेरे मन में कभी भी सांसारिक वस्तुओं की लालसा न रहे। केवल आत्मिक शांति ही लक्ष्य हो।

सतगुरु आत्मज्ञान दे, हरो देह अभिमान ! कह टेॐ सब घट विषे, दिखलाओ भगवान !!

हे सतगुरु! मुझे आत्मज्ञान दीजिए और इस देह के अहंकार को दूर कीजिए। हर प्राणी और वस्तु में मुझे भगवान का दर्शन कराइए।

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