करे करावे पुरष जो,
सेवा सुमरण दान !
कहे टेऊँ तिस पुरष का,
निश्चय हो कल्यान !!
श्री रामचरित मानस में कहा गया है कि ‘सब ते सेवक धर्म कठोरा’ – सेवा का व्रत सबसे कठोर है लेकिन ब्रह्मनिष्ठ, आचार्यप्रवर श्री स्वामी टेऊँरामजी महाराज ने उसको अतिशय सुगम ही नहीं अपितु इस सेवा के कार्य को अतुलनीय- अनुकरणीय बना दिया। वे स्वयं श्री अमरापुर आश्रम पर रेत उठाने का सेवा कार्य किया करते थे और सभी संत सेवादारियों से भी सेवा कार्य करवाते थे।
अनेकों बार प्रातः जब सारे संत सोये रहते थे, तब स्वामी टेऊँराम जी सबसे पहले उठ जाते थे और स्वयं आश्रम की साफ-सफाई झाडू आदि सेवा कार्य कर देते थे।
एक बिल्कुल सच्ची घटना है कि एक बार स्वामी टेऊँराम जी महाराज जी शीघ्र ही ब्रह्मवेला में जागे। उस समय मेले के दिन चल रहे थे। प्रातःकाल का समय था, जिससे कोई देखे नहीं, देखो- महापुरुष अब क्या कर रहे हैं। जो साधु संत दूर-दूर से मेले में आये हुए थे, उन साधु-संतों की चप्पल जूतियों को एक कपड़े से साफ करके पुनः उसे यथा स्थान रख दिया।
कुछ समय पश्चात् जब सभी संत कुटिया से बाहर आए, तब क्या देखते हैं कि जूते-चप्पलें एकदम साफ-सुथरे पड़े हैं। सभी परस्पर एक दूसरे से पूछने लगे – भाई! आश्चर्य से पूछा – ऐसी सेवा कौन करके गया?
तभी उस जमाने आश्रम पर एक चौकीदार था। उसने शायद स्वामीजी को ऐसी सेवा करते हुए देख लिया था। उसने आकर बताया- महाराज! ये सेवा आपकी और कोई नहीं करके गया, ये स्वयं स्वामी टेऊँराम जी महाराज ने की है, जिन्होंने सबेरे-सबेरे आप सभी संतों के जूते-चप्पलों को साफ किया है।
जब सन्तों ने ऐसा सुना तो सारे संत इकट्ठे होकर महाराज जी के पास आये और श्रीचरणों में गिरकर कहने लगे- हे स्वामी जी! आज आपने जो सेवा का उदाहरण प्रस्तुत किया है वो अत्यन्त दुर्लभ है। आज आपने हमें पाठ दिया है कि यदि हम भी सच्चे संत हैं तो आज आपसे यह शिक्षा लेते हैं कि चाहे हम कितने भी बड़े हो जाएँ, पद-प्रतिष्ठा मिल जाए पर सेवा में सदैव अग्रणी रहेंगें। मान प्रतिष्ठा से दूर रहेंगे।
ऐसे ही सदैव निरअभिमानी, मान-अपमान से दूर रहकर सेवा कार्य में तत्पर रहते थे- कर्मयोगी परम पुरुष सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज।
शत शत नमन!!!!
संत मोहन लाल जी महाराज (संत मोनूराम जी)
श्री अमरापुर स्थान, जयपुर
