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सिंधी समाज के इष्ट आराध्य वरुणावतार भगवान श्री झूलेलाल - अमरापुर दरबार

परम्परानुसार हमारे धर्मप्राण भारतवर्ष में अनेकानेक पर्व, उत्सव, तीज़, त्यौहार आदि बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाये जाते हैं। प्रत्येक पर्व-उत्सव के पीछे उसकी एक पृष्ठभूमि या इतिहास होता है, जिसके अन्तर्गत उस पर्व-उत्सव को मनाया जाता है। प्रत्येक कौम-जाति अपने धर्म के अनुसार स्वयं का पर्व बड़े श्रद्धा, भक्ति,आस्था, उत्साह, उमंग के साथ मनाती है. उसी प्रकार सिन्धी समुदाय का भी एक मुख्य महापर्व है- चेटीचण्ड ! जो कि पूरे विश्व भर में बड़े आनन्द उत्साह, श्रद्धा व भक्ति-भाव के साथ मनाया जाता है।

इस पर्व के इष्टदेव हैं वरुणावतार भगवान श्री झूलेलाल साईं ! जिन्हें जिन्दहपीर, लाल साईं, अमरलाल, उडेरोलाल के नाम से भी जाना जाता है।

चेटीचण्ड विक्रम संवत् का पवित्र शुभारम्भ दिवस है. ‘चेटीचण्ड’ में ‘चेटी = चैत्रमास’ अर्थात् नव सम्वत्सर का आरंभ होता है। ‘चण्ड = चन्द्रतिथि’ इस दिन सिन्धी समाज के लोग अपने इष्टदेव ज्योति स्वरूप भगवान श्री झूलेलाल की आराधना, पूजा-अर्चना श्रद्धा-भाव के साथ करते हैं और अपनी आस्था का अर्ध्य चढ़ाकर श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं। इस दिन सिन्धी समाज के लोग प्रसन्नचित होकर ‘आयोलाल-झूलेलाल’ का उद्घोष कर एक दूसरे को भगवान झूलेलाल के जन्म व नववर्ष की बधाईयाँ देते हैं। साथ ही ज्योति जलाकर, बहराणे साहब के रूप में उसकी पूजा-अर्चना आराधना करके सिंधी लोकनृत्य डॉडिया व मटका नृत्य करके भगवान झूलेलाल जयंती का महोत्सव बड़े ही भक्ति-भाव से मनाते हैं। इस चेटीचण्ड महापर्व की पृष्ठभूमि के इतिहास की ओर ध्यान केन्द्रित करना भी आवश्यक है। जैसा कि भगवान श्रीकृष्ण की श्रीमद्भगवद्गीता में घोषणा है-

‘यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानम् धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।। परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।।’

अर्थात् ‘जब-जब धर्म का ह्रास होने लगता है, अधर्म और पाप बढ़ जाता है, तब-तब मैं स्वयं किसी न किसी रूप में अवतार लेकर पापियों का नाश कर धर्म की रक्षा करता हूँ।’

इसी प्रकार जब सिन्ध प्रदेश के ठट्ठा नामक नगर में एक अत्याचारी मिरख बादशाह नामक शासक का राज्य था। वह हिन्दुओं के प्रति अतिक्रूर था। वह हिन्दुओं को मुसलमान बनाना चाहता था, जिससे उसे जन्नत प्राप्त हो सके। उसने अपने राज्य में घोषणा करवा दी कि यदि हिन्दू लोग मुसलमान नहीं बनेंगे तो उन्हें सख़्त सजा दी जावेगी। इस दृष्टिकोण से हिन्दुओं पर कई प्रकार के अत्याचार किये जाने लगे, यहाँ तक कि हिन्दू धर्म की निशानी शिखा (चोटी) काटकर जनेऊ उतरवाये जाने लगे। हिन्दू धर्म की जाति को नष्ट कर स्वयं के धर्म में मिलाने का प्रयास किया जाने लगा।

शास्त्र कहते हैं कि अपने धर्म से कभी भी च्युत नहीं होना चाहिए। अपना धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है. जैसा कि गीता जी में एवं सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज अपनी अमृतवाणी में कहते हैं-

धर्म अपने मांहि हरदम प्यार कर नटना नहीं। सीस जावे जान दे पर, धर्म से हटना नहीं ।।

अपने धर्म में स्थित रहने पर जान भी गँवानी पड़े तो घबराना नहीं चाहिए। अर्थात् अपने धर्म को ही श्रेष्ठ मानकर अपने धर्म से ही स्नेह-प्यार करना चाहिए। साथ ही अपनी जाति व मातृभाषा को महत्व देना चाहिए।

अत्याचारों से पीड़ित त्रस्त हिन्दू त्राहिमाम कर उठे। मिरखशाह के जुल्मों से तंग होकर सिन्धी हिन्दू लोग सिन्धु नदी के पावन तट पर आये और लगातार तीन दिनों तक ध्यान लगाकर वरुण देवता की पूजा-अर्चना व स्तुति करने लगे।

भक्तों के वश में रहे, कह टेऊँ भगवान। योग क्षेम तांका करे, सुख सम्पति मान ।।

लोगों के हृदय की करुणा भरी पुकार भगवान ने सुनी एवं आकाश की गर्जनाओं के साथ आकाशवाणी हुई हिन्दुओं ! तुम लोग निर्भय एवं निश्चिन्त हो जाओ। मिरख बादशाह तुम्हारा बाल भी बांका नहीं कर सकेगा। मैं शीघ्र ही तुम्हारी रक्षार्थ नसरपुर में अपने भक्त रतनराय के घर माता देवकी के गर्भ से जन्म लूँगा।

यह आकाशवाणी सुनकर सभी हिन्दू गद्गद् हो उठे और भगवान की जय-जयकार करते घर लौट आये। समय अनुसार विक्रम सम्वत् १००७, चैत्र के महीने शुक्रवार के शुभ दिन सायंकाल के समय प्रभु परमात्मा ने भक्त रतनराय के घर माता देवकी के गर्भ से सुन्दर बालक के रूप में जन्म लिया, जिनका नामकरण उदयचन्द के रूप में किया गया। सिन्ध प्रदेश के नागरिकों को जब मालूम पड़ा तो वे आनन्द विभोर होकर झूमने लगे। इन्द्र देवता भी प्रभु परमात्मा के अवतरित होने की खुशी में नन्हीं नन्हीं बूंदों के रूप में पुष्पों की वर्षा करने लगे। समयानुसार उदयचन्द बाल लीला कर बड़े होने लगे। उनकी अद्भुत लीलाएँ दिन-प्रतिदिन पूरे सिन्ध प्रदेश के घर-घर में चर्चित हो रही थीं।

धीरे-धीरे इस तेजस्वी बालक की बात मिरख बादशाह के कानों तक पहुँची एवं वह नित्य प्रति भयानक सपने देखने लगा। अब हिन्दुओं को विश्वास हो गया कि स्वयं भगवान उनके रक्षक बनकर भू-लोक पर अवतरित हुए हैं। बाल्यावस्था से ही भगवान झूलेलाल के अलौकिक लीलाओं की घटनाएँ होने लगीं जिनको देख-सुनकर मिरख बादशाह भयभीत हो गया उससे विश्वास हो गया कि धरती पर अवश्य ही भगवान अवतार लेकर आए है और हार मानकर स्वयं भगवान श्री झूलेलाल की शरण में आ गया !

तब भगवान श्री झूलेलालजी ने बादशाह को समझाया कि सारी सृष्टि प्रभु ने उत्पन्न की है। हिन्दू-मुसलमान एक ही हैं। मुसलमान जिसे खुदा कहते हैं, हिन्दू उसे ईश्वर कहते हैं। अर्थात् मंजिल सभी की एक ही है। अब बादशाह की समझ में सब कुछ आ गया। इस प्रकार अधर्म समाप्त होकर धर्म की जय हुई।

इस धरा धाम पर भगवान श्री भगवान श्री झूलेलाल साईं जी ने अनेक अलोकिक लीलाएँ की एवं लोगों को सत्उपदेश देकर उनका कल्याण किया। हिंदू धर्म की रक्षा कर सनातन धर्म की पताका फहराई ! सम्वत् १०२० में वरुणावतार भगवान श्री झूलेलाल भाद्रपद शुक्ला चतुर्दशी को अचानक जल समाधि लेकर अर्न्तध्यान हो गये।

सिन्धी समुदाय की शौर्य-गाथा अभी से ही नहीं, अपितु अनादि काल से चली आ रही है। जैसा कि नाम से विख्यात है। इतिहासकारों को भी मानना पड़ा कि सिन्धु घाटी की सभ्यता, जिनकी हस्तलिखित शिल्प कृतियाँ जो खुदाई द्वारा मोअन जो दड़ो, हड़प्पा के रूप में दुनिया के सामने आई, अर्थात् कितनी न प्राचीन है, यह सिन्धु घाटी की सभ्यता !

अर्वाचीन ग्रंथों के अनुसार ‘सिन्धु नदी’ (जिसका वर्णन वेदों में भी किया गया है) सबसे प्राचीन तो ‘सिन्धु नदी’ को ही माना गया है। वेदों की रचना भी सिन्धु नदी के पावन तट पर की गई थी। श्रीरामचरित मानस में भी सिन्ध शब्द का अनेक बार उल्लेख मिलता है! महाभारत काल में भी सिन्धु नरेश का वर्णन किया गया है। राष्ट्रगान में ‘पंजाब सिन्ध गुजरात मराठा..’ आदि सिन्ध की महत्त्वता को दर्शाते हैं। सृष्टि प्रारम्भ में सर्वप्रथम सिन्ध ही था। कालान्तर में सिन्ध से ही हिन्द शब्द प्रतिपादित हुआ। भागवत, रामायण, महाभारत व अनेक वेद ग्रंथों में जगह-जगह पर सिन्ध शब्द को महत्त्व दिया गया है। सिन्धु सभ्यता अनादि काल से चली आ रही प्राचीन परम्परा व सनातन संस्कृति है। ज्योतिषीय गणना का ग्रंथ भी निर्णय सिन्धु ही है।

सिन्ध प्रदेश के अनेकानेक संत महात्माओं ने भी सिन्धु नदी के पावन तट पर ही जन्म लिया है। जैसे- भगवान श्री झूलेलाल साईं जी, स्वामी आसूराम जी महाराज, स्वामी लीलाशाहजी, भगत कंवरराम, साईं वसणशाह और प्रेम प्रकाश पंथ के आचार्य सद्‌गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज आदि संत-महात्मा-दर्वेश- फकीर भी इसी सिन्धु नदी के पवित्र तट पर अवतरित हुए हैं। तब से चली आ रही ये प्राचीन सिन्धु सभ्यता की सनातन संस्कृति आज तक प्रचलित है। जो कि सिन्धी सभ्यता के नाम से सुविख्यात है। इसी सिन्धी समुदाय की परम्परा को कायम रखने के लिये मनाया जाता है- प्रत्येक वर्ष महापर्व चेटीचण्ड झूलेलाल जयंती, सिन्धियत दिवस !

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