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गुरु पूर्णिमा पर विशेष लेख: गुरु व शिष्य का स्नेहात्मक अटूट अनोखा सम्बन्ध - अमरापुर दरबार

गुरु व शिष्य का स्नेहात्मक अटूट अनोखा सम्बन्ध

गुरु व शिष्य का अनोखा व अटूट सम्बन्ध होता है। अगर शिष्य का गुरु के प्रति समर्पण भाव है तो गुरु भी पूर्ण रूप से शिष्य का आधार स्तम्भ होता है। जब एक दूसरे के प्रति स्नेह भाव हो तब शिष्य का गुरु के प्रति और गुरु का शिष्य के प्रति गहरा अतुलीय सम्बन्ध बन जाता है। शिष्य की स्मृति सदैव श्री गुरुदेव के चरणों में स्थित होती है। साथ ही श्री गुरुदेव भगवान अपने शिष्य की पालना करते है। जैसे माता घर का कोई भी कार्य क्यों न कर रही हो पर उसका पूरा ध्यान नन्हें बालक पर टिका रहता है। किसी कारण बालक अगर माँ से दूर भी हो जाए तो माँ का वात्सलय उसे बच्चे की ओर स्वतः ही खींच ले आता है। ऐसा ही गुरु-शिष्य का अनोखा अटूट सम्बन्ध था- दादा गुरु श्री साईं आसूरामजी महाराज व सद्गुरु साईं टेऊँरामजी महाराज का!

एक समय दादा गुरु साईं आसूरामजी महाराज अपने हालाना गांव बैठे थे। एकाएक उनका ध्यान अपने शिष्य साईं टेऊँरामजी की ओर गया। मन ही मन अपने बालवत शिष्य से मिलने हेतु खण्डू गाँव साईं टेऊँराम जी के पास जाने को उद्यत हुए। कहा भी गया है ‘सत्गुरु शिष्य की करत पालना, माता पिता ज्यों बालक की’ तब दादा जी निकल पड़े अपने प्रिय शिष्य की पालना करने। एक ओर गुरु के मन शिष्य से मिलने की उत्कंठा और दूसरी ओर साईं टेऊँराम जी के मन में भी गुरु दर्शन की लालसा ! उसी वक्त जाग्रत हो उठी, मन ही मन गुरु दर्शन की लालसा लिये निकल पड़े साईं टेऊँराम भी! जिस प्रकार भगवान को भक्त की और भक्त को भगवान के दर्शनों की हृदय में तीव्र लालसा होती है। उसी प्रकार आज यहाँ भी गुरु को शिष्य की और शिष्य को गुरु के दर्शनों की प्यास खींच रही है, दोनों एक दूसरे से मिलने को आतुर ! हृदय की पुकार हृदय तक ! तीव्र उत्कंठा !

गुरु और शिष्य का स्नेहात्मक मिलन

किसी ने सही ही कहा- अब हमारे इश्क का अंदाज ही कुछ और है। हमको उन पर नाज है तो उनको भी हम पर नाज है।।

दादा साईं आसूरामजी महाराज निकले अपने गाँव से और शिष्य टेऊँराम निकले गुरु दर्शनों के लिये अपने गाँव से! देखो ! कितना अनोखा व अटूट सम्बन्ध है। दोनों के मन में थी मिलन की पिपासा, एक-दूसरे से मिलने की आतुरता ! ऐसा होता है गुरु-शिष्य के हृदय की तार का मिलन ! मार्ग में चलते चले जा रहे थे एक ओर गुरुदेव दादा साईं आसूरामजी और दूसरी ओर साईं टेऊँराम बाबा! राह के बीचों-बीच हुआ “गुरु शिष्य” का अनोखा मिलन! दोनों एक-दूसरे को बड़े स्नेह भाव से निहार रहे थे। प्रेम विहलता छलक रही थी। श्री गुरुदेव के दर्शन कर साईं टेऊँराम के प्रेमाश्रु बह चले…

तब निकट पहुंचकर साईं टेऊँराम अपने श्री गुरुदेव दादा आसूरामजी के श्रीचरणों में नत मस्तक हुए…… दण्डवत् प्रणाम किया। श्री गुरुदेव ने स्नेहपूर्वक टेऊँराम को गले लगाया। श्रीगुरुदेव का अपने शिष्य पर इतना स्नेह, इतना दुलार, इतनी कृपा! वाह! बड़ा आनन्द हुआ! ऐसा होता है गुरु और शिष्य का अनूठा अतुलीय, अवर्णनीय स्नेहात्मक सम्बन्ध।

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