Skip to content

श्री प्रेम प्रकाश मण्डल के तृतीय पीठाधीश्वर...प्रेमावतार सतगुरु स्वामी शान्तिप्रकाश महाराज जी का संक्षिप्त जीवन परिचय - अमरापुर दरबार

सतगुरु स्वामी शान्तिप्रकाश जी महाराज का जन्म श्रावण मास की पूर्णमासी, रक्षाबंधन, मंगलवार , सन्- 1907 में सिन्ध के पवित्र गाँव ‘चक नगरी’ में हुआ था !

स्वामी जी के पिता श्री का नाम “श्री आसूदाराम” और माता श्री का नाम “जुगलबाई” था ! दोनों बड़े धार्मिक व संत सेवी थे !

स्वामी जी का बाल्यकाल का नाम “खेराज” था ! जो युगपुरुष सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज ने शिक्षा-दीक्षा के पश्चात् “शान्तिप्रकाश” रखा !

स्वामी जी बचपन से ही बहुत मेधावी थे ! वे हर आध्यात्मिक बात को बड़े ध्यान से सुनते थे और जल्दी ही समझ लेते थे !

स्वामी जी तीसरी कक्षा स्कूल की पास करने के पश्चात् 11 वर्ष की आयु में उन्हें बड़ी माता चेचक निकली ! जिसके कारण उनकी आँखों की ज्योति चली गई ! किन्तु अंदर की ज्योत जाग्रत हो गयी !

स्वामी जी के घर वालें उनकों लेकर सिंध के “सिद्ध संत सांई हरचूराम जी साहिब” के पास ले गए ! स्वामी जी को देखकर उन्होंने कहा- बालक तो बड़ा संत होगा ! सारे जग में नाम रोशन करेगा ! संतों का वचन सत्य हुआ !

स्वामी जी 12 वर्ष के हुए ! तब ‘महायोगी सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज’ मण्डली सहित ‘चक नगरी’ पधारें ! तब सद्गुरु और शिष्य का आत्मीय मिलन हुआ !

सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज (टण्डाआदम) में स्वामी जी को अपने साथ आश्रम पर लेकर आये और ‘श्री गुरु दरबार’ व संतो की सेवा में लगा दिया ! उनकी सेवा से प्रसन्न होकर कुछ समय पश्चात् “श्री गुरुदेव भगवान” ने नाम-दान की दीक्षा प्रदान की !

स्वामी जी ‘श्री गुरु आश्रम’ की सेवा बड़े श्रद्धा प्रेम भाव से किया करते थे ! भंडारे में बर्तन साफ करना, झाडू लगाना व संतों आदि की सेवा में सदैव तत्पर रहते थे !

सद्गुरु महाराज जी की आज्ञा पाकर स्वामी जी ने प्रारम्भिक विधा अध्ययन के लिए हैदराबाद (सिंध) में ऋषि दयाराम गिदूमल संस्कृत विद्यालय में संस्कृत भाषा का अध्ययन किया !

स्वामी जी ने समस्त शास्त्रों के अध्ययन हेतु हरिद्वार चेतन देव की कुटिया में स्वामी शंकरानन्द भारती एवं महंत श्री गुरूमुख दास जी से वेदान्त, विचार माला, विचार चन्द्रोदय, विचार सागर, वृत्ति प्रभाकर, रत्नावली, तत्व अनुसंधान एवं और भी कई वेद वेदान्त तत्व ज्ञान सम्बन्धी ग्रन्थों का अध्ययन किया !

स्वामी जी “श्री गुरु ग्रन्थ साहिब” के गूढ़ अर्थों को समझने के लिए कुछ समय अमृतसर भी गये ! वहाँ उन्होंने कर्मसिंह का कटरा स्थान पर ज्ञानी हमीरसिंह जी के मार्गदर्शन में “श्री गुरुग्रन्थ साहिब” का गहन अध्ययन किया !

स्वामी जी को सद्गुरु स्वामी सर्वानन्द जी महाराज के पश्चात् सभी संतो ने सन्- 1977 में “श्री प्रेम प्रकाश मण्डल” की गुरु गाद्दी पर विराजमान किया हैं !

स्वामी जी ने 15 वर्ष तक श्री प्रेम प्रकाश मंडल की बागडोर को बड़े सुचारू रूप से संभाला और “श्री गुरुदेव” की यश कीर्ति को चहुँ ओर फैलाया !

स्वामी जी ‘सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज’ के आज्ञानुसार ही कार्य करते थे और फिर सतगुरु स्वामी सर्वानन्द जी महाराज में ‘आचार्य श्री’ वाला भाव रखकर उनकी आज्ञानुसार कार्य किया करते थे ! वे दो नहीं एक ही हैं ! ऐसा स्वामी जी का भाव होता था !

देश विभाजन के पश्चात् स्वामी जी कल्याण कैम्प में आए और वहाँ सतगुरु स्वामी सर्वानन्द जी महाराज की आज्ञानुसार ही सब कार्य करते रहे !

स्वामी जी ने प्रेमियों एवं संतों को ऐसा प्रेम-प्यार दिया ! जो सभी के हृदय में अमिट छाप छोड़ गया !

स्वामी जी मांस-मदिरा का परित्याग करने के लिए प्रेरित करते थे ! मांस मानवीय आहार नहीं हैं ! ये पशु-पक्षी प्रभु-परमात्मा की मूक संतान हैं ! इन पर दया करने से प्रभु प्रसन्न होते हैं ! अतः मास-मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए !

स्वामी जी करुणा एवं प्रेम की मूर्ति थे ! वे न केवल मानव मात्र को प्रेम करते थे ! परन्तु पशु-पक्षियों से भी स्नेह-प्रेम-प्यार किया करते थे !

स्वामी जी का संतों से विशेष प्रेम व लगाव था ! जहाँ पर भी संतों के आगमन का समाचार मिलता तो उनके दर्शन करने व मिलने अवश्य ही जाते थे !

स्वामी जी अनेक संत-महापुरुषों को बड़े ही प्रेम भाव से “श्री गुरु दरबार” पर रहने का आग्रह करते थे और बहुत प्रेम से उनकी सेवा करते और प्रेमियों से करवाते थे !

स्वामी जी का “श्री गुरु दरबार- श्री अमरापुर स्थान” जयपुर से विशेष प्रेम व लगाव था ! वृध्दावस्था में भी “समाधि-स्थल” जो की गर्भगृह में हैं ! वहाँ मथा टेकने अवश्य जाते थे !

स्वामी जी अक्सर कहते थे- मैं ‘प्रज्ञाचक्षु’ हूँ ! मेरे उपर तो सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज की अपार कृपा हैं ! जो मुझे लायक बनाया !

किसी काम के थे नहीं छुता नहीं को छाँव ! कृपा भयी गुरुदेव की पूजन लागे पाँव !!

स्वामी जी मर्यादा की प्रतिमूर्ति थे ! सद्गुरु स्वामी सर्वानन्द जी महाराज में अगाध श्रद्धा व प्रेम था ! जब वे आश्रम में पधारते थे तो उनकी बहुत सेवा- सुश्रुता किया करते थे ! उनकी सेवा से महाराज जी बहुत प्रसन्न होते थे !

स्वामी जी ‘श्री गुरुदेव सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज’ के साथ-साथ “श्री कृष्ण भगवान” के उपासक भी थे ! श्री कृष्ण भगवान से अत्यधिक प्रेम था ! उन्होंने भगवान की महिमा के अनेक भजनों की रचना भी की !

स्वामी जी “एकादशी व्रत” पर बहुत जोर देते थे ! स्वयं व्रत रखते थे और सभी से रखवाते थे ! देश-विदेश में एकादशी व्रत का बहुत प्रचार किया !

स्वामी जी ने समाज में फैली विषमता दहेज़ प्रथा, फैशन, जुआ, शराब, आदि समाजिक बुराईयों के विरुद्ध यत्र-तत्र प्रचार करते थे और बन्द कराने का अथक प्रयास किया !

स्वामी जी सच्चे गौ भक्त व सेवक थे ! वे गौ सेवा के लिए सबको प्रेरित करते थे ! उल्लास नगर में स्थित “श्री प्रेम प्रकाश आश्रम” में “राधेश्याम गौशाला” का निर्माण करवाया ! आज भी वहाँ हजारों गौ माताओं की सेवा होती हैं !

स्वामी जी 15 अगस्त 1992 को पंचभौतिक शरीर का त्याग कर ‘श्री गुरु चरणों’ में लीन हो गये !

प्रेमावतार सद्गुरु स्वामी शान्ति प्रकाश जी महाराज के ‘श्री चरणों’ मे शत्-शत् नमन व कोटि-कोटि वन्दन..

Post navigation

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *