🕉️!! ॐ श्री सत्नाम साक्षी !! 🕉️
7 सितम्बर सोमवार एकादशी पुण्य तिथि महानिर्वाण दिवस पर विशेष
आचार्य सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज की गुरुगद्दी के चतुर्थ पीठाधीश्वर मर्यादामूर्ति सद्गुरु स्वामी हरिदासराम जी महाराज
संक्षिप्त जीवन परिचय
सद्गुरु स्वामी हरिदासराम जी महाराज का जन्म – सिन्धी तारीख – 13 वैशाख – पूर्णिमा – 30 मार्च 1930 (रविवार) के दिन – सिन्ध के ‘घुन्डन’ गाँव में हुआ था । उनके पिताश्री का नाम ‘श्री हीरानंद जी’ और माता श्री का नाम ‘मोतिलबाई’ था ।
स्वामी जी ने नाम दान की दीक्षा ‘सतगुरु स्वामी सर्वानन्द जी महाराज’ से प्राप्त की थी ।
स्वामी जी श्री प्रेम प्रकाश मण्डल के चतुर्थ पीठाधीश्वर थे । ‘महाराज श्री’ ने 1992 से 2000 तक (8 वर्ष) प्रेम प्रकाश मण्डल के सेवा कार्यों को निष्ठा पूर्वक संभाला और श्री गुरुदेव की यश कीर्ति को चहुँ ओर फैलाया ।
स्वामी जी ने अनेक ग्रंथों की रचना की । जिसमे मुख्य – श्री अमरापुर दर्शन, नित्य नियम प्रार्थना एवं सतगुरु स्वामी सर्वानन्द जी महाराज का जीवन चरितामृत। इसी प्रकार स्वामी जी ने अनेक ग्रन्थ व भजनों की भी रचना की ।
स्वामी जी की ‘गुरु के प्रति’ अगाध निष्ठा थी । वे ‘महर्षि सतगुरु सर्वानन्द जी महाराज’ की खूब तन-मन से सेवा किया करते थे । श्री अमरापुर दरबार में सतगुरु सर्वानन्द जी के कमरे के पास ही एक छोटा सा कमरा बना हुआ था। वहीं निवास किया करते थे ! जहाँ आज उनका ‘चित्र प्रर्दशनी स्थल’ बना हुआ है !
स्वामी जी प्रातः ४ बजे से पहले उठ जाया करते थे। फिर ‘सद्गुरु सर्वानन्द जी महाराज’ की सेवा में दातुन, तोलिया, गर्म पानी आदि आवश्यक वस्तुएं पहले से ही तैयार करके रख देते थे ! सेवा कैसे करनी चाहिए… ? ये इन महापुरुषों से सीखना चाहिए। स्वामी जी सेवा में सदैव तत्पर रहते थे !
स्वामी जी आदर्श व मर्यादा की साक्षात मूर्ति थे । समय की पाबंदी का विशेष ध्यान रखते थे। उनका जीवन सरल व सादा था। वे सादे वस्त्र धारण करते व भोजन भी सादा ही खाते थे !
स्वामी जी सदैव ‘आचार्य उपासना’ को विशेष महत्व देते थे ! कहते थे- जैसे एक पेड़ की ‘जड’ (मूल) को पानी देने से सारी टहनियाँ हरी-भरी हो जाती है। वैसे ही ‘आचार्य श्री’ की भक्ति करने से सबकी पूजा हो जातीं हैं। ये ही सबसे बड़ी गुरु भक्ति हैं। अतः “आचार्य श्री सद्गुरु टेऊँराम जी महाराज” की ही भक्ति-उपासना सभी को करनी चाहिए ! उनका मंत्र सतनाम साक्षी का ही जाप करना चाहिए !
स्वामी जी आचार्य श्री का महामन्त्र सतनाम साक्षी जपने पर विशेष जोर देते थे। गुरु मंत्र ही सर्वश्रेष्ठ है। भक्तों को ‘गुरु मंत्र’ देते समय आचार्य श्री की प्रतिमा देते थे और कहते थे तुम्हें इन्हीं का ही ध्यान- चिंतन करना है ।
स्वामी जी की श्री गुरु दरबार के प्रति उनकी अनन्य निष्ठा थी । गुरु दरबार की सेवा स्वयं करते थे और सभी से करवाते भी थे। पदासीन होने पर भी अपने आप को हमेशा ‘गुरु दर’ का सेवादारी, सेवक मानते थे ।
स्वामी जी सत्संग प्रारम्भ करने से पहले ये प्रार्थना- सद्गुरु सर्वानन्द हमें- अभय दान दीजिए…और फिर… जय जय-जय टेऊँराम स्वामी – कृपा करो प्रभु अंतर्यामी… से पूर्ण किया करते थे।
स्वामी जी को रामायण, गीता, भागवत, उपनिषद, वेद आदि अनेक शास्त्रों का भरपूर ज्ञान था । सभी को शास्त्र पढ़ने के लिये प्रेरित करते थे ।
स्वामी जी मे सादगी, समय की पाबन्दी, मर्यादा, निडरता, निर्भीकता, सेवाभाव, गुरुभक्ति, संतो से स्नेहभाव, गुरु समर्पण और ‘आचार्य श्री’ के प्रति निष्ठा आदि अनेक गुण विद्यमान थे ।
स्वामी जी अक्सर सिंधी बोली को बचाने के लिये कहते थे । सिंधी बोली हमारी ‘मातृ भाषा’ है। घर मे सभी से सिंधी में बात करो । अपने धर्म व सिंधी बोली से प्यार करो । उसकी रक्षा करो । तभी हमारा सनातन धर्म व सिंधी बोली बचेगी।
स्वामी जी सन- 1996 में कुछ संतो को साथ लेकर सिन्ध यात्रा करने गए थे । वहां से आचार्य सद्गुरु टेऊँराम जी महाराज’ की ‘पावन जन्म स्थली- खंडू गांव’ एवं ‘श्री अमरापुर दरबार- टण्डा आदम’ की ‘पवित्र रज’ साथ लाये थे । उस ‘पवित्र रज’ वर्तमान श्री अमरापुर स्थान जयपुर में दर्शनों के लिए रखा गया है !
स्वामी जी सनातन हिन्दू धर्म की रक्षा के हेतु ‘जनेऊँ व चोटी’ धारण करने के लिये कहते थे – इसी के साथ कहते थे कि हमारे सिंधी समुदाय के इष्टदेव ‘भगवान श्री झूलेलाल जी’ है । हमें उनकी पूजा अर्चना छोड़नी नही चाहिए । चाहे हम किसी भी पंथ या सम्प्रदाय को क्यों न मानते हो ।
स्वामी जी ‘पावन चैत्र मेले’ के शुभ अवसर पर सदैव कहते थे- मेले के मालिक – आचार्य सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज है । हम तो उनके दास व सेवक है।
स्वामी जी 26 अगस्त 2000 शनिवार- एकादशी के दिन इस पंचभौतिक देह का त्याग कर ब्रह्म की ज्योत में लीन हो गए । ‘महाराज श्री’ के पार्थिव शरीर को तीर्थ नगरी हरिद्वार में ‘जल समाधि’ प्रदान की गई ।
ऐसे मर्यादामूर्ति सद्गुरु स्वामी हरिदासराम जी महाराज के पावन ‘श्री चरणों’ मे शत-शत नमन… कोटि-कोटि वन्दन…
🖋️ प्रेम प्रकाशी संत श्री मोहन लाल जी महाराज (संत मोनू राम जी)
Shri Amrapur Sthan, Jaipur
