हर साल की तरह आ गया सिन्धी समाज का महापर्व चेटीचण्ड ! पूरे भारतवर्ष में जोर-शोर से तैयारियाँ – चेटी चण्ड कार्यक्रमों के मध्य विभिन्न सांस्कृतिक और धार्मिक कार्यक्रम !
क्या, कभी सोचा ? इष्टदेव का जन्म दिवस या पर्व क्यों मनाते हैं? क्या कारण था अवतार लेने का ? विचार करके देखो ! क्या हम जो ये पर्व मना रहे हैं, उनसे भगवान प्रसन्न हो जायेंगे ! जिस कारण उन्होंने अवतार लिया था ! क्या हम उस धर्म को निभा रहे हैं ?
हर मनुष्य जानता है कि हमें अपने धर्म पर स्थित रहना चाहिये ! धर्म के अनुसार चलना चाहिये ! धर्म अनुसार जाति व संस्कृति का पालन करना चाहिए ! पर करता नहीं! क्यों..? क्योंकि उसे अपने जाति, धर्म से प्यार नहीं ! मात्र दिखावे के लिये बड़े-बड़े आयोजन कर लेगा ! त्योहार उत्सव पर्व आदि मना लेगा ! किन्तु उसके इतिहास व महत्व को जानने का प्रयास ही नहीं करता !
परम पूज्य श्रद्धेय सत्गुरु स्वामी हरिदासराम जी महाराज चेटीचण्ड महापर्व पर एक बात का विशेष जोर देते थे ! वे सभी से पूछते थे कि भगवान श्री झूलेलाल जी ने अवतार क्यों लिया..? सभी का कहना होता था-हिन्दू जाति धर्म की रक्षा हेतु ! हिन्दू धर्म क्या?? चोटी व जनेऊ (हिन्दू धर्म की रक्षा के दो मुख्य चिन्ह)- तो भगवान ने अवतार लिया- हिन्दू धर्म की रक्षा हेतु अर्थात् चोटी व जनेऊ की रक्षा !
पहले तो अत्याचारी मिर्खशाह द्वारा धर्म पतित किया जा रहा था, पर अब हमारे ऊपर कौन अत्याचार कर रहा है? कौन हमारे जनेऊ व चोटी काट रहा है? विचार करो ! स्वयं अपने धर्म की रक्षा नहीं कर पा रहे हो तो पर्व-उत्सव मनाने से क्या लाभ ! सत्य क्या है..? विचार करना !
इतिहास देखने पर मालूम पड़ता है कि वरुणावतार भगवान श्री झूलेलाल ने हिन्दुओं की धर्म रक्षार्थ अवतार लिया था ! विधर्मियों द्वारा हिन्दुओं पर अत्याचार हो रहे थे ।अपने धर्म में मिलाने के लिये चोटी व जनेऊ को काटकर धर्म से पतित किया जा रहा था ! हमारा धर्म नष्ट कर रहे थे! तब हिन्दुओं ने अपने धर्म की रक्षा के हित भगवान से करुणा भरी पुकार की, हे भगवान् ! हमारी रक्षा करो, हमारे धर्म की रक्षा करो ! तब वरुणावतार भगवान श्री झूलेलाल साईं जी ने इस धरा पर अवतार किया ! धर्म की रक्षा की ! धर्म को पुनः स्थापित किया ! दूसरे धर्म में जाने से रक्षा की ! जिस प्रकार गीता में भगवान द्वारा कहा गया है कि-
‘स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ।’
अपने धर्म में तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरे का धर्म भय को देने वाला है !जैसे मछली का पानी ही जीवन है वैसे ही धर्म भी मनुष्य का जीवन है ! अतः सदैव अपने धर्म पर स्थिर रहना चाहिये ! अब विचार करना होगा कि क्या हम अपने धर्म का पालन कर रहे हैं…? क्या हम हिन्दुओं ने जनेऊ व शिखा धारण कर रखी है? नहीं ना ! तो फिर हम अपने इष्टदेव का अपमान कर रहे हैं ! फिर अपने धर्म की रक्षा कैसे कर सकेंगे???जिन्होंने कष्ट सह करके अवतार लिया ! हम सबका का दुःख दूर किया- पर हम उस धर्म को निभा नहीं रहे !
पहले तो दूसरों के द्वारा अत्याचार हो रहा था, धर्म से विमुख किया जा रहा था पर अब! हमारे ऊपर कौन अत्याचार कर रहा है…? हम स्वतंत्र होते हुए भी तो परतंत्र हैं ! अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं ! स्वयं अपने आपको पंगु बना रहे हैं- अत्याचार कर रहे हैं- स्वयं अपने धर्म से पतित हो रहे हैं ! अतः अपने धर्म को बचाना होगा ! सभी हिंदुओं को चोटी व जनेऊ धारण की पहल करनी होगी !!!
सदगुरु स्वामी टेऊंराम जी महाराज ने अपनी वाणी में लिखा है – धर्म अपने माहिं हरदम, प्यार कर नटना नहीं ! सीस जावे जान दे, पर धर्म से हटना नहीं !!
धर्म के खातिर ही कई सन्तों, ऋषियों-मुनियों और वीरों ने अपने प्राणों तक की आहुतियाँ दे दी थीं ! धर्म रक्षा के खातिर ही उस परब्रह्म परमात्मा को बार-बार इस भारत भूमि पर अवतरित होना पड़ता है ! अतः मनुष्य को चाहे कितनी ही भयंकर यातनाएँ क्यों न भुगतनी पड़ें- पर अपने धर्म पर सदा स्थित रहना चाहिये ! स्वधर्म को परधर्म से उत्कृष्ट ही समझना चाहिये ! स्वधर्म पालन हो जाये तो भी अपने को महान् भाग्यशाली समझना चाहिये !
अतः अपने धर्म की रक्षा हेतु हिन्दू भाईयों को सचेत करो ! सनातन धर्म की रक्षा पहले स्वयं करो ! अपने धर्म को कायम रखने के लिये जनेऊ व चोटी (शिखा) धारण करो !स्वयं धारण कर अन्य सभी को इस पुण्य-कार्य के लिये प्रेरित करो ! तभी अपना धर्म बचेगा और अपने इष्टदेव को प्रसन्न कर सकोगे ! फिर चेटीचण्ड भगवान श्री झूलेलाल जयंती मनाना हमारा सार्थक, सफल होगा !
