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स्वामी सर्वानंद जी महाराज के जीवन चरित्र से - चैत्र मेला पावन प्रसंग - अमरापुर दरबार

सदगुरु टेऊँराम तेरी – मैने देखी महान शक्ति भेजने वाले स्वामी टेऊँराम – लेने वाले स्वामी टेऊँराम…

संत-महापुरुषों की लीला अपरम्पार ! वे जैसा चाहें- वैसा कर सकते हैं ! फिर चाहे मिट्टी को भी सोना कर दे या फिर सोने को मिट्ठी ! महापुरुषों के लिए कुछ भी असंभव नहीं !

ऐसे ही थे परमहंस महायोगी सिंध हिंद के महान संत, परम पुरुष, समस्त ऋद्धि-सिद्धि के दाता युगपुरुष आचार्य श्री सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज ! उनके देहोत्सर्ग के पश्चात् जब पहला चैत्र मेला सिंध टण्डाआदम दरबार में स्वामी सर्वानन्द जी महाराज की अध्यक्षता में मनाया जा रहा था ! मेले की तैयारियाँ जोर-शोर से चल रही थी! जिज्ञासु और आम लोग मेले में भाग लेने के लिए आ रहे थे! उस समय कोठार (भण्डार) की व्यवस्था (देखभाल) पर स्वामी चन्दनप्रकाश जी थे! श्री प्रभदास और उसके एक सेवाधारी ने आकर प्रभदास जी को कहा कि “आज रात के लिए तो भोजन की व्यवस्था हो गयी और कल सबेरे बच्चों के लिए जो खिचड़ी बनेगी ! इतने दाल-चावल हैं ! बाकी लोगों के लिए शीघ्र भोजन सामग्री का प्रबन्ध करें।

सूचना पाकर प्रभदास स्वामी चन्दनप्रकाश जी के पास गये और भोजन सामग्री के विषय में पूछा- उन्होंने कहा कि- भोजन सामग्री इतनी नहीं है जो कल के लिए भोजन बन सकें ! इस विषय में आप जाकर स्वामी सर्वानन्द जी महाराज को बता दे! फिर स्वामी जी की जैसी आज्ञा होगी वैसा किया जायेगा !

श्री प्रभदास स्वामी जी के पास जब आते हैं ! उस समय नगर के कुछ सेठ लोग स्वामी जी के पास बैठे थे और मेले के लिए अन्न, घन इत्यादि की अपनी सेवाएँ देने के लिए प्रार्थना कर रहे थे ! स्वामी चन्दनप्रकाश जी भी अनुरोध करने लगे कि इनको राशन के लिए बोले! तब स्वामी सर्वानन्द जी का तो एक ही उत्तर था कि हम श्री गुरू महाराज के सिवा और किसी के सामने हाथ नहीं फैलायेंगे ! मैं अभी जाकर अपने गुरुदेव को (जो सबसे बड़ा सेठ है) भोजन सामग्री इत्यादि के विषय में प्रार्थना करता हूँ ! अगर गुरुदेव ने मेले के लिए आज रात भर में भोजन सामग्री की पूरी व्यवस्था कर दी तो ठीक हैं ! नहीं तो मैं और आप दोनों यहाँ से चले जाएँगे! जिनका मेला हैं- वहीं आकर पूरा करेंगे ! हम तो उनके दास – सेवक है ! इस विषय में सवेरे पांच बजे से पहले मुझे सूचना दे ! स्वामी जी की यह बात सुनकर प्रभदास अवाक रह गये!

अब रात होने लगी ! स्वामी जी मंदिर में श्री गुरुदेव भगवान के पास गये और मेले के कार्यों को गुरुदेव के सामने निवेदन करने लगे ! लगभग आधी रात बीत चुकी थी ! अचानक एक ट्रक और सात बैलगाड़ियी सामान से भरी हुई दरवाजे के सामने आकर खड़ी हो गई ! ट्रक और गाड़ियों के चालक बड़े जोर-जोर से “भगत टेऊँराम. २ भगत टेऊँराम… २ कहकर पुकारने लगे ! सेवादारी आवाज सुनकर सावधान हो गये और एकदम दौड़कर वहीं गये और चालकों से पूछने लगे कि क्या बात है.? उन्होंने कहा कि “भगत टेऊँराम को बुला लाओ.. तो सामान सभाल ले, हमें देर हो रही है ! उनको जल्दी बुला लाओ ! प्रभदास ने उन चालकों से पूछा कि “ये सामान किसने भेजा है. ?” उन्होंने कहा कि- “सेठ लक्ष्‌मीनारायण ने भेजा है! प्रभदास ने सारा सामान संभाल कर भण्डार में रखवाया ! फिर चालको को कहा कि “जरा ठहर जाओ तो मैं स्वामी जी को बुलाकर ले आता हूँ ! उन्होंने कहा कि हमें देर हो रही है, फिर कभी आयेंगे ! ऐसे कहकर वे लोग चले गये ! फिर भी प्रभदास उनके पीछे गया ! मगर वे किंचित क्षण न जाने कहाँ अदृश्य हो गये ! कुछ आता पत्ता नहीं ! सवेरा होते ही प्रभदास स्वामी जी के पास गया ! चरणों में प्रणाम…, कर सारी घटना सुनाई और कहा कि धन्य है आपकी गुरुभक्ति और श्री गुरुदेव में आपका अटूट अटल विश्वास ! भगवान और गुरुदेव भक्तों के कारण कैसे कैसे रूप धारण कर सर्व मनोरथ सिद्ध कर देते है !!

ऐसे ही जब कभी भी सद्गुरु स्वामी सर्वानन्द जी महाराज को किसी भी चीज की जरूरत पड़ती थी तो वह अपने “इष्ट भगवान श्री सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज” के समक्ष प्रार्थना करते थे ! अपने गुरुदेव को ही अपना इष्ट भगवान, सब कुछ मानते थे !

सद्गुरु सदा मेरे साथ हैं- मुझे उन्हीं का ही आसरा हैं! वे उन्हे हर समय-पल- घड़ी अपने साथ देखते थे ! हमेशा यही कहते थे सदगुरु टेऊँराम के बिन और कोई मुझे आधारा !!

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