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🕉️ ॐ सतनाम साक्षी 🕉️

संत चरित्र

🔅 संत-महात्माओं का स्वावलम्बी जीवन 🔅

मजदूरी करके लिया,
इकतारे का साज !
भूल न किससे माँगिये,
कैसा भी हो काज !!

महापुरुषों का जीवन सरल एवं सादगी पूर्ण होता है। उनका एक ही लक्ष्य होता है। परमात्मा की बन्दगी, नाम जप करके भगवान को प्राप्त करना। वे कभी भी किसी वस्तु की आवश्यकता होने पर भी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाते। जैसा कि संतो की सीख है – “माँगन मरण समान है – मत माँगो कोई भीख”।

एक समय कर्मयोगी युगपुरुष सत्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज को भगवद्-भजन हेतु ‘यकतारे’ वाद्ययंत्र की आवश्यकता पड़ी। पैसों का अभाव था। संत का धन-दौलत से क्या काम? फक्कड़, वैरागी संत महात्मा। “माँगन मरण समान है” अर्थात किसी के आगे हाथ फैलाना ठीक नहीं। यह संत महात्माओं का काम नहीं। किसी के आगे भूलकर भी कभी हाथ नहीं फैलाना चाहिए। मांगना नहीं चाहिए। जिसे भगवान पर पूर्ण भरोसा होता है या स्वयं पुरुषार्थी होता है, उसके सर्व मनोरथ स्वयं ही सिद्ध हो जाते हैं।

इसी बीच किसी स्थान पर मकान बन रहा था। वहाँ स्वामी जी ने चार-पाँच दिन मेहनत-मजदूरी करके दस रुपये पारिश्रमिक के रूप में प्राप्त किए। उसी पारिश्रमिक धन से ‘यकतारा’ वाद्ययंत्र खरीदा। फिर तो और भी अधिक भक्ति की अलख जाग गई। इकतारे को लेकर खूब भगवत् भजन किया। खूब सत्य सनातन धर्म का प्रचार-प्रसार किया। नई-नई आध्यात्मिक वाणी का संचार किया। बहुत भजन, दोहे, पद, छंद आदि की रचना की। जगह-जगह परमात्मा की अलख जगाई।

इसी प्रकार पूरे जीवन भर कर्मयोगी सत्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज ने कभी भी किसी के सामने हाथ न फैलाकर ‘स्वावलम्बन व आदर्श जीवन’ का परिचय दिया। हमें भी कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना चाहिए। पुरुषार्थ और परिश्रम करना चाहिए। संत-महापुरुष तो कर्मयोगी और कर्त्तव्य-परायण होते हैं। स्वयं कर्मयोगी होकर दूसरों को भी शिक्षा और प्रेरणा देते हैं।

शत्-शत् नमन – धन-धन सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज!

🖋️ प्रेषक:- प्रेम प्रकाशी संत श्री मोहनलाल (संत मोनू राम जी)
Shri Amrapur Sthan, Jaipur

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