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19 जुलाई 2026 रविवार

कर्मयोगी युगपुरुष आचार्य श्री १००८ सदगुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज की 140 वीं जयंती पर विशेष

भक्ति के विशाल व्योम और कर्म उपासक आचार्य श्री 1008 सदगुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज

मनुष्य जन्म से नहीं अपितु कर्म से महान् बनता है! जिसने अपने अन्तर्गत जाग्रति प्राप्त कर उस मूल तत्त्व को जान लिया, उन्होंने सब कुछ पा लिया! यह जीव प्रेम, पुरुषार्थ, कर्मशील बनकर मन में सेवा भाव रखे तो शीघ्र ही परमात्मा को प्राप्त कर सकता है और सेवा से जीव अपना भाग्योदय करता है! सेवा भी भक्तिका ही एक स्वरूप है!

नवधा भक्ति

श्री रामचरित मानस में वर्णित नवधा भक्ति को युगपुरुष सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज ने आत्मसात् कर जीवन में अपनाया। स्वयं श्री गुरुदेव भगवान ने अपने सत्संग-प्रवचन में भक्ति के विषय पर ये कहा है—

श्रवण, स्मरण, कीर्तन, पद सेवन भगवान।
अर्चन, वन्दन, दास्यरति, सख्य, समर्पण जान।।

नवधा भक्ति में एक भी भक्ति निभाने वाला मोक्ष प्राप्त कर लेता है! जैसे बलि ने समर्पण भक्ति कर मुक्ति प्राप्त कर ली।

सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज ने अनेक साधु-संतों की संगत में भगवान के विभिन्न रूपों का श्रवण कर, प्रभु का सदैव स्मरण बाल्यावस्था से ही किया। सखाओं एवं भक्तों को संग लेकर भगवान का कीर्तन किया। भगवान के पद की सेवा, दास्य प्रेम, सखा के भाव रखकर उनकी अर्चना-वन्दना में अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया।

ऐसे भक्त सदैव अजर-अमर हो जाते हैं।

सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज का जन्म भक्ति-भाव रखने वाले माता-पिता (कृष्णादेवी-श्री चेलाराम) के घर (खण्डू गाँव, जिला हैदराबाद, सिन्ध) में विक्रम सम्वत् 1944 आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी शनिवार के दिन हुआ।

बाल्यकाल और भक्ति

बचपन में ही एकांत में बैठकर बालमण्डली के साथ राम-नाम की धुनि लगाते थे।

‘यकतारे’ को लेकर स्वरचित भजन विभिन्न राग-रागनियों में गाते हुए श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देते थे। भक्त भी सांसारिक व्यवहारों और कार्यों को त्यागकर स्वामी जी के सत्संग में लीन हो जाते थे। भक्ति सागर में भक्तजन गोते लगाते हुए परब्रह्म के साथ एकाकार हो जाते थे।

सत्संग का महत्व

अज्ञानवश ही जीव स्वयं और भगवान में भेद करता है तथा द्वैतभाव रखता है। आत्मज्ञान प्राप्ति के बाद जीव ब्रह्म के साथ एकाकार होकर अद्वैत भाव धारण कर लेता है। इसके लिए सत्संग और गुरु की आवश्यकता होती है।

कहा भी गया है—

सत्संग से सत्गुरु मिले, सत्गुरु से निज ज्ञान।
कहे टेॐ निज ज्ञान से, मिलहिं पद निर्बान।।

भक्ति के विशाल व्योम में “युगदृष्टा सद्गुरु श्री स्वामी टेऊँराम जी महाराज” जैसे तेजपुंज मंडित नक्षत्र का उदय हुआ और उन्होंने सत्संग की पावन मंदाकिनी में लौकिक दुःखों से पीड़ित लोगों के संताप नाश का शुभारम्भ किया।

सत्संग रूपी वटवृक्ष को कोई भी तोड़ नहीं सकता। सत्संग कल्पतरु के समान है, इसमें जो जैसा भाव रखता है उसे वैसा फल मिलता है।

सत्संग निज कल्पतरु- सकल कामना देत।

सेवा और सत्संग

इस कलिकाल में भवसागर को पार करने के लिए सत्संग और सेवा सबसे सरल एवं सुगम साधन हैं।

कलियुग में प्रधान है
सेवा पुनि सत्संग।
कहे टेऊँ जिसके किये,
होवे भव दुःख भंग।।

कर्मयोग का संदेश

सद्गुरु महाराज भक्ति के साथ-साथ कर्मप्रधान थे। शुभ कर्मों के प्रणेता थे और भक्तों को सदैव शुभ कर्म करने के लिए प्रेरित करते थे।

पूर्व के शुभ कर्मों से मनुष्य देह मिली है, तो वर्तमान में भी शुभ कर्म करके मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। मनुष्य को केवल कर्म करना चाहिए, फल की इच्छा नहीं रखनी चाहिए।

श्री गुरुदेव भगवान ने समाज में ऊँच-नीच का भेद समाप्त करते हुए स्वयं कुत्ते को उठाकर कर्मशील होने का परिचय दिया।

श्री अमरापुर दरबार के निर्माण के समय वे स्वयं मिट्टी, रेत, बजरी आदि उठाकर सेवा किया करते थे।

इसी प्रकार सेवा एवं उदारता का परिचय देकर एक सूरश्याम बालक पर कृपा कर उसे पारंगत “केवल गवैया” के नाम से प्रसिद्ध किया।

धर्म-कर्म ना छोड़िये, जब तक तन में श्वास।
कह टेॐ करते रहो, धारे मन विश्वास।।

सेवा का आदर्श

जीवन पर्यन्त श्री गुरुदेव भगवान कर्मशील बने रहे।

वे साधु-संतों, गरीबों, अनाथों, अतिथियों तथा गौ-सेवा में निरन्तर लगे रहे।

रामायण में भी कहा गया है—

कर्म प्रधान विश्व कर राखा।
जो जस करहिं सो तस फल चाखा।।

चैत्र मेले के अवसर पर आश्रम में स्वयं साफ-सफाई करना, मेहनत मजदूरी कर ‘यकतारा’ खरीदना तथा अतिथियों की भोजन, जल एवं आवास की सेवा करना उनके जीवन के प्रेरणादायी प्रसंग हैं।

30-35 फुट ऊँचे रेत के टीले पर श्री अमरापुर धाम की स्थापना कर उन्होंने असम्भव कार्य को सम्भव कर दिखाया।

प्रेम प्रकाश पंथ की स्थापना

सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज भक्ति और कर्म के अद्भुत उपासक थे।

वैदिक धर्म की रक्षार्थ उन्होंने अपने साधना बल एवं भक्ति के प्रताप से प्रेम प्रकाश पंथ, श्री प्रेम प्रकाश ग्रंथ, सतनाम साक्षी महामंत्र तथा पावन तीर्थ श्री अमरापुर धाम की स्थापना कर विश्व इतिहास में अमिट छाप छोड़ी।

महाराज श्री की प्रमुख धरोहर

1. पावन तीर्थ स्थल

महायोगी तपस्वी श्री सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज का पावन तीर्थ स्थल जयपुर में “श्री अमरापुर स्थान (डिब)” के नाम से प्रसिद्ध है।

यहाँ भव्य मंदिर, ग्रन्थ कक्ष, श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर, लड्डू गोपाल मंदिर, श्री अमरापुरेश्वर मंदिर, गौशाला, यज्ञशाला, प्रदर्शनी स्थल एवं समाधि स्थल स्थित हैं।

2. रचित ग्रंथावली

  • श्री प्रेम प्रकाश ग्रंथ (795 पृष्ठ)
  • श्री प्रेम प्रकाश दोहावली
  • श्री ब्रह्मदर्शनी
  • श्री कवितावली-छन्दावली
  • श्री अमरापुर वाणी
  • सलोक माला
  • सोलह शिक्षाएं
  • शान्ति के दोहे
  • अमर कथा

3. पावन स्मृतियाँ

जयपुर में सद्गुरु टेऊँराम गोशाला, उज्जैन में सद्गुरु टेऊँराम घाट, रामेश्वर धाम, हरिद्वार के विभिन्न घाट, सद्गुरु टेऊँराम चौक, अमरापुर अरावली एक्सप्रेस ट्रेन सहित अनेक विद्यालय, मार्ग, सेवा केन्द्र, हॉस्पिटल, गौशालाएँ, एम्बुलेंस एवं अन्नक्षेत्र उनके नाम से संचालित हैं।

विश्व के प्रसिद्ध पंचांगों एवं कैलेंडरों में भी “सद्गुरु टेऊँराम जयन्ती” को स्थान प्राप्त है।

4. महाप्रयाण

महापुरुष कर्मयोगी आचार्य श्री सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज ने 55 वर्षों तक सनातन धर्म का प्रचार-प्रसार किया।

संवत 1999, पुरुषोत्तम सिंधी तारीख 4, शनिवार प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उन्होंने अपनी पंचभौतिक देह का विसर्जन किया।

उनकी आत्मज्योति परब्रह्म की महाज्योति में समा गई और उनका दिव्य आलोक आज भी अनन्त जीवों का मार्गदर्शन कर रहा है।

प्रेषक:
प्रेम प्रकाशी संत मोहन लाल जी महाराज
अमरापुर स्थान, जयपुर

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