🕉️ ॐ श्री सत्नाम साक्षी 🕉️
28 अगस्त 2026 शुक्रवार
स्वामी शांति प्रकाश जी महाराज जन्म दिवस (जयंती) पर विशेष आलेख
भक्ति, प्रेम, ज्ञान की अलख जगाने वाले महापुरुष
सतगुरु स्वामी शान्तिप्रकाश जी महाराज
सृष्टि विकास के लिये होता है महापुरुषों का अवतरण! एक विकास बाहरी, जो भौतिक संसाधनों द्वारा पूरा होता है और दूसरा व्यक्ति के आन्तरिक चेतना का विकास! वह भौतिक संसाधनों से नहीं अपितु आध्यात्मिक स्त्रोतों से ही संभव होता है! ऐसे आध्यात्मिक, धार्मिक स्त्रोत संत-महात्माओं द्वारा ही विकसित होते हैं! जिसके माध्यम से जिज्ञासु उस परम रस का आस्वादन करके अपने जीवन को आनन्दमय व भक्ति से परिपूर्ण कर देता है!
सन्त-महापुरुषों का जीवन स्वयं के लिये नहीं अपितु मानवता की भलाई व निःस्वार्थ सेवा के लिये होता है! संत तो स्वयं परमात्मा के ही अंश होते हैं! जो समय-समय पर इस पवित्र धरा धाम पर अवतार लेते हैं और जीवों का कल्याण करते हैं!
महापुरुष अपने सुखों की तिलांजलि देकर समस्त संसार के जीव मात्र के कल्याण में सदैव तत्पर रहते हैं! साथ ही इस धर्मप्राण भारतवर्ष में भक्ति, प्रेम, ज्ञान व शान्ति का प्रकाश फैलाते हैं!
ऐसे महापुरुषों की श्रेणी में आचार्य सदगुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज के परम शिष्य हमारे पूज्य सद्गुरु स्वामी शान्तिप्रकाश जी महाराज का स्थान वन्दनीय है!
नाम ही के अनुरूप शान्ति प्रकाश! जो सदैव भक्तों के हृदय में शान्ति का प्रकाश फैलाते हैं, सबको शान्ति का पाठ पढ़ाते हैं! जिनका नाम लेने व दर्शन मात्र से संतप्त हृदय को सहज ही परम शान्ति की प्राप्ति होती है!
ऐसी ही प्रभु सत्ता की महान विभूति परम तपस्वी महावैरागी सद्गुरु स्वामी टेऊँरामजी महाराज! जिनके परम शिष्य थे महान कर्मयोगी सद्गुरु स्वामी शान्तिप्रकाशजी महाराज! जिनका जन्म श्रावण मास सन् १६०७ नारियल पूर्णिमा (सत्यनारायण), रक्षा बन्धन के पवित्र दिन, सिन्ध के सक्खर जिले के चक नामक गांव में हुआ! आपके पिता का नाम श्री आसूदोमल एवं माता का नाम श्रीमती जुगलबाई था! दोनों बड़े संतोषी व संत सेवाभावी थे! जिसका प्रभा ‘महाराजश्री’ के जीवन पर पड़ा!
मैत्री करुणा मुदिता,
त्याग तपस्या रूप।
सतगुरु शान्तिप्रकाश जी,
संत शिरोमणि अनूप।।
“महाराज श्री” का मन बाल्यावस्था में ही संसार से उपराम होकर परमात्म चिन्तन में स्थित हो गया! वे सदैव प्रभु भक्ति में तल्लीन रहते थे! समय के साथ महाराजश्री की प्रारम्भिक शिक्षा पाठशाला से शुरू हुई! किन्तु अचानक चेचक नामक बीमारी से उनके बाह्य चक्षुओं की ज्योति जाती रही! अनेक उपाय करने पर भी पुनः ज्योति वापस न आ सकी! तब माता-पिता उन्हें सिन्ध के प्रसिद्ध थल्हे वाले “संत श्री साईं हरचूराम साहिब” की शरण में ले आए! संतश्री ने कहा- चिन्ता की कोई बात नहीं! यह बड़ा महान संत बनेगा! संतश्री की वाणी सार्थक हुई!
समय पाकर “महाराज श्री” को भगवद् स्वरूप अवतारी सिद्ध संत महापुरुष सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज का दर्शन हुआ! कुछ समय तक आचार्यश्री का पावन सानिध्य, दर्शन व सत्संग, सेवा व सुमरण का लाभ प्राप्त हुआ! महाराजश्री की निष्ठा, सेवा, स्मरण, एकाग्रता को देखकर युगदृष्टा पूज्य सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज ने मंत्रदीक्षा देकर उन्हें अपना शिष्य स्वीकार किया!
आचार्यश्री की आज्ञा शिरोधार्य कर स्वामीजी श्री अमरापुर दरबार (डिब) पर पूर्ण श्रद्धाभाव, उत्साह, निष्ठा के साथ सेवा स्मरण में सदैव संलग्न रहते थे!
कुछ समय पश्चात् आचार्य सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज से आज्ञा लेकर संस्कृत भाषा, गुरुवाणी, रामायण इत्यादि सत्शास्त्रों के अध्ययन हेतु अमृतसर, हरिद्वार, काशी आदि स्थानों पर जाकर शिक्षा ग्रहण की! आध्यात्मिक चिन्तन-मनन के पश्चात् गुरु का संदेश जन-जन तक पहुँचाया! पूरे विश्व में भ्रमण कर अपने ज्ञान द्वारा हजारों भक्तों को शान्ति व प्रेम का पाठ पढ़ाया! आचार्यश्री की आज्ञानुसार निष्काम सेवा कार्य में भी तत्पर रहकर मानव सेवा, समाज सेवा, मूक प्राणी अर्थात् जीवमात्र की सेवा करके अपने गुरु के यश कीर्ति को उज्जवल बनाया! आपने मृदुता, शीलता, शान्त सरल स्वभाव से सबको अपना बना लिया! कहते हैं ऐसे महापुरुषों के अवतार लेने से विश्व वसुन्धरा भी कृतार्थ हो जाती है!
महायोगी आचार्य सद्गुरु स्वामी टेऊँरामजी महाराज के परम शिष्य गो-पालक, श्रीकृष्ण स्वरूप, परोपकारी, कर्मयोगी ‘सद्गुरु स्वामी शान्तिप्रकाशजी महाराज’ के प्रादुर्भाव पर समस्त विश्व की धरा वन्दनीय बन जाती है! जिनके दर्शन मात्र से हृदय में प्रेम, भक्ति, ज्ञान की अलख स्वयं जाग्रत हो जाती है!
आप गुरु में पूर्ण आस्था व विश्वास रखते थे! गुरु को भगवान व इष्ट मानते थे! आप सदैव अपनी वाणी में कहते थे कि श्री गुरुदेव सद्गुरु स्वामी टेऊँरामजी महाराज व सद्गुरु स्वामी सर्वानन्दजी महाराज साक्षात् रूप में आज हर समय हमारे साथ हैं! वे हमारी रक्षा करते हैं! प्रेरणा पुंज बनकर हमारे घट-घट में निवास करते हैं! उनके आशीर्वाद ने ही इस ‘सूर श्याम दास’ को इस लायक बनाया!
किसी काम के थे नहीं,
छूता नहीं कोई छाँव!
कृपा भई गुरुदेव की,
तो, पूजन लागे पाँव!!
आप जब भी किसी बड़े संत-महापुरुषों से मिलते थे तो सदैव “गुरुदेव सद्गुरु श्री 1008 स्वामी टेऊँराम जी महाराज” का ही परिचय देते थे । बड़ी बड़ी सत्संग सभाओं में एक बात बड़े ही डंके की चोट पर मर्मस्पर्शी स्वर में विनयपूर्वक कहते थे मेरे जैसे सूरदास का क्या मूल्य? ‘यह तो सब कृपा हमारे महायोगी आचार्य सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज की है, जो इस दास को इतना लायक बनाया!’ ऐसी विनयशीलता थी आपकी सद्गुरु टेऊँरामजी महाराज के प्रति! इन्हीं सद्गुणों के कारण आप ध्रुव तारे के समान सदैव वन्दनीय व पूजनीय बन गये!
समय की गति और समुद्र की लहरों को कोई रोक नहीं सकता! ऐसे में मृत्युलोक का सभी को परित्याग करना पड़ता है! आपने अपनी जीवन लीला का पूर्ण कर श्रावण मास में श्री अमरापुर धाम ब्रह्मलोक प्रस्थान किया! आपकी ज्योति महाज्योति में समा गयी! बहु प्रतिभाओं से विभूषित आपका अलौकिक जीवन हमारे लिये सदैव प्रेरणा व प्रकाश का पुंज बना रहेगा!
सेवा कर्मणि संलग्नं
परे ब्रह्मणि संस्थितम्!
श्री स्वामी शांति प्रकाशं,
सद्गुरुं नित्य नमामि!!
प्रेम के पुंज है- प्रेमावतार सदगुरु स्वामी शांतिप्रकाश जी महाराज को कोटि कोटि वंदन, शत शत नमन!!!
🖋️ संत मोहन लाल जी महाराज
(संत श्री मोनूराम जी)
Shri Amrapur Sthan, Jaipur
