स्वामी जी का जीवन गहरे समुद्र के समान था । अनमोल रत्नों के भांति उनके गुण और उनकी गूढ़ वाणी अद्भुत थी ।
मर्यादामूर्ति सतगुरु स्वामी हरिदासराम जी महाराज हरि की साक्षात मूरत थे । यथा नाम तथा गुण ! हरि का दास ! उनके गुणों का वर्णन नही किया जा सकता है ।
युगपुरुष आचार्य सतगुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज के प्रति उनकी पूर्ण निष्ठा और ‘आचार्यों उपासना’ स्वामी जी का मूल मन्त्र था ।
अपने सत्संग के द्वारा ‘आचार्य’ के प्रति भक्ति और श्रद्धा का बीज स्वामी जी ने प्रेमियों के मन में बोया ।
गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर स्वामी जी सदैव अपने प्रवचनों में कहते थे- ‘आचार्य श्री’ का सम्मान और उनके द्वारा दिए गए मन्त्र ‘सतनाम साक्षी’ का जप व सन्मान प्रत्येक शिष्य का कर्तव्य है । आचार्य सतगुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज ही हम सब प्रेम प्रकाशियों के आधार स्तम्भ हैं । मूल जड़ है । उनकी पूजा हमें विशेष रूप से करनी चाहिए । हमने उनकी पूजा कर ली तो समझो श्री प्रेम प्रकाश मंडल के सभी संतो की पूजा सेवा कर ली । हमें जड़ (मूल) को सींचना है । टहनियों को नहीं ।
स्वामी जी में कितनी न निर्मानता व सरलता थी । जहाँ सत्संग करते थे- वहाँ सर्व प्रथम ‘आचार्य श्री’ की बड़ी प्रतिमा रखवाते थे । सर्व प्रथम उनको प्रणाम करके ही सब कार्य प्रारम्भ करते थे ।
सन् 1996 में स्वामी जी ‘सिन्ध यात्रा’ पर गए थे तो वही से भी ‘आचार्य सतगुरु टेऊँराम जी महाराज’ के पावन जन्मस्थली ‘खण्डु गाँव’ और श्री अमरापुर दरबार टण्डोआदम की ‘पवित्र रज’ साथ लाए थे । उस पवित्र रज को वर्तृर्तमान में श्री अमरापुर स्थान जयपुर के ‘श्री मन्दिर’ में प्रेमियों के दर्शनार्थ हेतु रखा गया है ।
स्वामी जी अपना सर्वस्व ‘श्री गुरुदेव सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज’ को संमर्पित कर स्वंय निष्कामी बन सभी सेवा कार्यों को किया करते थे और कहते थे सब कार्य आचार्य श्री कर रहे है । हम तो उनके दास व सेवक है ।
हम सब भी ‘आचार्य जी’ से यही प्रार्थना करे कि हम भी उनके दास बनकर ‘श्री गुरु दरबार’ की तन मन से सेवा, नाम – सुमरण, भक्ति पूजा पाठ आदि करके अपने जीवन को सफल और सार्थक बना सके ।
‘महाराज श्री’ के ‘श्री चरणों’ में हमारा कोटि-कोटि वन्दन..
