समय के पाबंद, ज्ञाननिष्ट सादगी, त्याग, मर्यादा की साक्षात् मूर्ति – सद्गुरु स्वामी हरिदासराम जी महाराज
महायोगी आचार्य सदगुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज की परम्परा के महापुरुष एवं प्रेम प्रकाश मण्डल के चतुर्थ पीठाधीश्वर थे – स्वामी हरिदासराम जी महाराज
ब्रह्मनेष्ठी, ब्रह्मश्रोत्री, अनन्तश्री आचार्य-प्रवर श्री 1008 सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज ने ‘प्रेम प्रकाश पंथ’ का जो दिव्य पौधा लगाया था, सद्गुरु स्वामी सर्वानन्द जी महाराज एवं सद्गुरु स्वामी शान्तिप्रकाश जी महाराज ने उसे अपनी अटल गुरु-भक्ति, ज्ञान और वैराग्य से सींच कर एक विशाल वृक्ष का रूप दिया! सद्गुरु स्वामी हरिदासराम जी महाराज ने अपनी सेवा, सादगी, त्याग और तपस्या से उसे एक विशाल वट-वृक्ष बनाया और उन्होंने सनातन धर्म और श्री प्रेम प्रकाश मण्डल का आध्यात्मिक सौरभ विश्व के कोने-कोने में फैला दिया ! मर्यादामूर्ति सद्गुरु स्वामी हरिदासराम जी महाराज ‘श्री प्रेम प्रकाश मण्डल’ की परम पावन गुरु- गद्दी पर पीठासीन होने वाले चौथे महापुरुष थे !
स्वामी हरिदासराम जी महाराज का अवतरण, जन्म 30 मार्च 1930 को सिंध प्रदेश के एक छोटे से गांव ‘घुण्डन’ में हुआ था ! उनकी माता श्रीमती मोतिल देवी और पिता श्री हीरानन्द जी धार्मिक, संतसेवी और आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाले थे। सद्गुरु स्वामी सर्वानन्द जी महाराज रिश्ते में स्वामी जी के मामा लगते थे! अतः उन्हें धार्मिक संस्कार और आध्यात्मिक वातावरण वहीं से मिला था! बचपन से ही वे अपने माता-पिता के साथ श्री अमरापुर दरबार में संतों महात्माओं के दर्शन और प्रवचन सुनने जाया करते थे। इसका प्रभाव उनके कोमल किन्तु जिज्ञासु मन पर गहरा पड़ा। उन्होंने शास्त्रों का गहन स्वाध्याय किया था।
वे अपने माता-पिता के कार्यों में उनकी सहायता किया करते थे और सादा सरल जीवन व्यतीत करते थे। एक बार सद्गुरु स्वामी सर्वानन्द जी महाराज और अन्य संतों के प्रवचन सुनने का उनके मन पर गहरा प्रभाव हुआ और उन्होंने सांसारिक गतिविधियों से दूर रहकर, आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर होने की ठान ली। सद्गुरु स्वामी सर्वानन्द जी महाराज जी की आज्ञा अनुसार ‘श्री प्रेम प्रकाश आश्रम हरिद्वार’ में रहकर बड़ी ही निष्ठा और लगन से हर प्रकार की सेवा की। उनकी सेवा से प्रसन्न होकर सद्गुरु स्वामी सर्वानन्द जी महाराज ने उन्हें श्री अमरापुर स्थान, जयपुर में सेवा प्रदान की ! और ‘स्वामी सर्वानन्द जी महाराज’ से ‘नामदान’ की दीक्षा लेकर गुरुसेवा में लग गये !
गुरु सेवा और अनुकरणीय गुरुभक्ति वे अपने गुरुदेव से पहले उठ जाते थे। वे पहले अपने गुरुदेव को भोजन कराते फिर स्वयं करते थे ! सत्संग के समय हारमोनियम पर उनके साथ बैठते थे। सद्गुरु स्वामी सर्वानन्द जी महाराज ने जब आचार्यश्री सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज के सग्रन्थों का संकलन किया तो उनकी छपाई की सेवा भी स्वामी जी ही देखते थे। वे स्वयं भी एक अच्छे लेखक और कवि थे। उन्होंने सत्शास्त्रों का गहराई से अध्ययन किया और वे सदैव सभी को वेद शास्त्रों, श्रीमद् भागवत, गीता, योग वशिष्ठ और श्री प्रेम प्रकाश ग्रन्थ का अध्ययन करने को कहते थे। उन्होंने सद्गुरु स्वामी सर्वानन्द जी महाराज के साथ देश-विदेश में सनातन धर्म का प्रचार और प्रसार किया।
आचार्यश्री के प्रति उनकी अटल श्रद्धा,अगाध विश्वास और अडिग भक्ति स्वामी हरिदासराम जी महाराज को यत्र तत्र सर्वत्र आचार्य श्री ही दिखाई देते थे। वे कहा करते थे कि आचार्यश्री पूजा अर्चना करने पर सब संतों की पूजा अर्चन स्वतः हो जाया करती है। उन्होंने आचार्यश्री के नाम का सुन्दर वर्णन किया है-
‘टे’ त्रिगुण स्वरूपाय, ‘ऊँ’ निर्गुण निरूपणे ! टेॐ ब्रह्माधिनाय, नमस्तस्यै नमो नमः !!
सद्गुरु स्वामी शान्तिप्रकाश जी महाराज के ब्रह्मलीन होने के पश्चात् उन्हें सन् 1992 में प्रेम प्रकाश मण्डलाध्यक्ष के पद पर पीठासीन किया गया। वे व्यास पटल पर बैठने और प्रवचन के पहले गुरुदेव एवं आचार्य श्री की महिमा गाया करते थे। सद्गुरु सर्वानन्द हमें अभय दान दीजिये…. और फिर पूर्णाहुति भी ‘जय-जय टेऊँराम स्वामी, कृपा करो प्रभु अन्तर्यामी’ ‘तुम ही सत्गुरु, तुम पितु माता, तुम ही हरिहर तुम ही विधाता’ से किया करते थे !
कहते हैं फिर गुरु-गद्दी पर आसीन होने पश्चात् उनमें भी वैसा ही ओज और वैसा ही तेज, वैसा ही आभा मण्डल और वाणी में भी वैसी ही श्रेष्ठता और माधुर्य आ गया था जैसा कि श्री प्रेम प्रकाश पंथ के संस्थापक आचार्य श्री में था। न केवल इतना ही उनके पूर्व पीठासीन हुए सद्गुरुओं के दिव्य गुणों का भी उनके व्यक्तित्व में समावेश हो गया !
वे त्याग और तपस्या, सेवा और सादगी, विद्या और विनय की अद्भुत मूर्ति थे ! उनके पास देश-विदेश से बच्चों, बूढ़ों, महिलाओं और पुरुषों के अनेक पत्र आते थे और अनुशासनप्रिय स्वामी जी सभी पत्रों के उत्तर समयानुसार देकर उनके व्यवहारिक और पारमार्थिक जीवन का मार्ग प्रशस्त किया करते थे। वे प्रायः कहा करते थे- ‘शक्ति के बिना शिव’, ‘शिव’ न रहकर ‘शव’ बन जाता है।
वे सिंधी भाई बहनों से अपने बच्चों को सिंधी भाषा और सिंधी सभ्यता से अवगत करने, उन्हें सिंध के वीरों – सपूतों, संतों – महात्माओं की कथाओं से अवगत कराने को कहते थे। मेले के दिनों में वे एक सजग प्रहरी और कुशल व्यवस्थापक की भांति दिन-रात कार्य करते रहते थे ! उनमें ब्रह्मज्ञानी महात्माओं के सद्गुण विद्यमान थे !!
आध्यात्मिक जगत् की ऐसी विशिष्ट विभूति, संत शिरोमणि पूज्य सद्गुरु स्वामी हरिदासराम जी महाराज 26 अगस्त सन् 2000 (शनिवार) को ब्रह्मलीन हो गये। ऐसे दिव्य पुरुष पंच भौतिक शरीर को त्यागकर ब्रह्मलीन होने के पश्चात् विश्व-व्यापक हो जाते हैं। उनकी अमृतमयी वाणी अमर है, उनका सहज स्नेह, अहेतुकी कृपा, उनका सआचरण, उनके पावन संस्मरण अमर हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिये प्रेरणा-स्त्रोत रहेंगे ! उनके पावन श्रीचरणों में सहस्रों बार नमन-वन्दन !
