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स्वामी सर्वानंद पुण्य तिथि 30 जुलाई 2005 पर विशेष लेख: गुरु के प्रति निष्ठा एवं पक्का विश्वास - अमरापुर दरबार

!! गुरु के प्रति निष्ठा एवं पक्का विश्वास !!

एक गुरू की शरण ली, एक गुरू का आधार ! एक भाव से भक्ति कर, हो गये भव से पार !!

महापुरुषों के पास अपनी निजी शक्तियाँ ही बहुत होती हैं! उनको दूसरों से सहायता की आवश्यकता नहीं पड़ती… महर्षि अगस्त्य जी बिना किसी की सहायता के अकेले ही सारे समुद्र के जल को एक ही घूँट में पी गये… अकेले कपिलदेव मुनि के दृष्टिपात से महाराजा सगर के साठ हजार पुत्र जलकर राख हो गये… ऐसी अनेक शक्तियाँ योगियों के पास होती हैं! उनके लिये दुनिया में कोई भी कार्य कठिन नहीं है! गीता के अनुसार जो योगी भगवान के भक्त हैं, वे अपनी शक्तियाँ कभी प्रकट नहीं करते हैं! उनकी शक्तियाँ दुनिया के लोगों को दिखलाने के लिये नहीं होती हैं! साधारण लोगों को आश्चर्य में डालने या उनको डराने धमकाने, अपने वश में करने के लिये नहीं होती हैं!.. न ही अपनी प्रभुता बढ़ाने या प्रतिष्ठा ज़माने के लिये भी महापुरुष अपनी शक्तियों का प्रयोग नहीं करते हैं!

अतः वीतराग तपस्वी सद्गुरु स्वामी सर्वानन्द जी महाराज के अपने जीवन में जितनी भी कठिन परिस्थितियाँ आयीं पर उन्होंने अपना धर्म नहीं छोड़ा न कभी किसी के आगे हाथ फैलाया! उन्हें तो अपने श्री गुरुदेव भगवान महायोगी सद्गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज के ऊपर पूर्ण दृढ़ विश्वास था! फिर भी कभी-कभी आश्रम के कार्यभार को देखते हुए थोड़े घबरा जाते थे!

ऐसे ही एक समय मन ही मन सोच रहे थे…..एक तरफ दरबार का कर्जा चुकाना था तो दूसरी तरफ गौशाला थी, सौ सवा सौ लोगों के लिये प्रतिदिन भोजन भी बनता था, दरबार के और भी सेवा कार्य चलते थे! यह सब देखकर स्वामीजी घबरा गये, सोचने लगे, ये सारे कार्य मुझसे कैसे संभाले जायेंगे! गुरू महाराज जी को मालूम थी कि किसी से भी पाई पैसा माँगना नहीं है! माँगने की इच्छा भी मन में नहीं लानी है, न किसी को सीधी या किसी के द्वारा दान देने की प्रेरणा देनी है! क्योंकि सनातन धर्म माँगना नहीं सिखाता है!

माँगन मरन समान है, मत को माँगे भीख ! माँगन से मरना भला, यह सत्गुरु की सीख !!

रहिमन वे नर मर चुके, जो कहं माँगन जाहिं ! तिन ते पहले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं !!

इस विषय पर संतों महात्माओं ने बहुत कुछ कहा है! माँगने का, भले ही कोई युग धर्म बताकर और दलीलें देकर माँगने का समर्थन करें, परन्तु संत महात्मा युग धर्म के पीछे नहीं चलते, वे तो सत्य सनातन धर्म का अनुसरण करते हैं!

गुरु दरबार के कार्य-भार के विषय में सोचते हुए स्वामी सर्वानन्द जी महाराज लेट (सो) गये और उनको नींद आ गयी! अर्धरात्रि को स्वामी जी उठे और कुटिया से बाहर निकले, इधर-उधर घूमकर फिर कुटिया में जाने लगे तो किसी ने आवाज दी सर्वानन्द ! औ ! सर्वानन्द ! आवाज पहचान कर स्वामी जी उधर गये जहाँ से आवाज आयी थी…. कंडी नामक पेड़, जिसके नीचे परम पूज्य श्री गुरुदेव भगवान सद्‌गुरु स्वामी टेऊँराम जी महाराज पहले पहले आकर बैठे थे! वहाँ पहुँचकर आश्चर्य में पड़ गये, क्या देखा! गुरू महाराज जी खड़े हैं, लाठी हाथ में है और मुस्करा रहे हैं! स्वामी जी पहले डर गये, पर फिर संभल कर चरणों में साष्टांग दण्डवत् प्रणाम किया! प्रणाम कर ज्योंही खड़े हुए तो अपने को कुटिया में सोया हुआ अनुभव किया! फिर वही आवाज आयी सर्वानन्द ! क्या सोच रहे हो, चिन्ता छोड़कर सेवा में लग जाओ! आप किसी बात की चिन्ता न करें…. आवाज सुनकर स्वामी जी सहसा जाग पड़े, उठकर बत्ती जलायी, देखा तो कुटिया का दरवाजा अन्दर से बंद है, अभी-अभी तो मैं बाहर निकला था, जो कुछ देखा या सुना वह स्वप्न था, या प्रत्यक्ष था! इस प्रकार स्वामी जी को कई बार गुरू महाराज जी के दर्शन हुए! तब से स्वामी सर्वानन्द जी महाराज कहा करते थे कि गुरुदेव भगवान लाठी लेकर पूरे दरबार साहब में घूम रहे हैं, हम सबकी देखभाल कर रहे हैं! अब हमें कोई चिन्ता नहीं है! तब से स्वामी जी शोक, मोह, भय, भ्रम से रहित होकर सेवा में लग गये! इसी प्रकार स्वामी जी ने गुरू महाराज जी के कई बार दर्शन किये थे!

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