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स्वामी सर्वानंद जी महाराज वाचनामृत - अमरापुर दरबार

!! पतिव्रता स्त्री की शक्ति !!

तीर्थार्थिनी तु या नारी पतिपादोदकं पिबेत् । तस्मिन् सर्वाणि तीर्थानि क्षेत्रानि च न संशय ।।

तीर्थों में स्नान करने की इच्छा से, जो नारी तीर्थ यात्राएं करती है, परन्तु यदि वह नारी श्रद्धा से अपने पति के चरणों को धोकर उस जल से स्नान करती है और उस जल को पीती है, सिर पर चढ़ाती है, तो निश्चय समझो, उसने सब तीर्थ कर लिये, इसमें कोई संशय नहीं है !

संकेतः- जनक नन्दिनी माता सीताजी की खोज करते हुए, श्री हनुमानजी अशोक वाटिका (लंकापुरी) में पहुंचे, वहां माता सीताजी को चरण स्पर्श कर अपना पूरा परिचय दिया और उनका दर्शन कर बहुत प्रसन्न हुए ! फिर सुर विजयी राक्षसराज रावण की अत्यन्त प्रिय वाटिका के फलों को खाया, तत्पश्चात् उस सुन्दर वाटिका को तहस नहस कर डाला, फिर कञ्चन नगरी लंकापुरी को जलाकर माता सीताजी के पास आये और उनसे प्रभु श्री रामचन्द्रजी के पास जाने की आज्ञा मांगी, जाते समय माता सीताजी की अत्यन्त दुःखी दशा देखकर श्री हनुमानजी ने हाथ जोड़कर कहा कि हे माता ! आपको इस दुष्ट राक्षस के कारागार में बन्द देखकर मुझसे सहा नहीं जाता ! यदि माता जी – आपकी आज्ञा हो तो अभी आपको अपने कंधों पर बिठाकर भगवान श्रीरामजी के पास ले चलूं ! भगवान श्रीरामजी की कृपा से मुझे कोई भी नहीं रोक सकेगा !

श्री हनुमानजी की वीरोचित बातें सुनकर माता सीताजी बहुत प्रसन्न हुई, श्री हनुमानजी को अशीर्वाद और धन्यवाद देते हुए कहा, पुत्र हनुमान ! तुम्हारे बल तथा तेज को मैं अच्छी तरह से जानती हूं। तुम्हारे बल और बुद्धि का कोई थाह नहीं है। तुम अकेले ही रावण को सेना सहित मारकर मुझे श्री रामजी के पास ले चलने में समर्थ हो, परन्तु पुत्र ! तुम्हारे कन्धों पर बैठने से मेरा “पतिव्रत धर्म” नाश हो जायेगा ! मेरे पतिव्रत धर्म के नाश होते ही मेरे पति श्रीरामजी की शक्ति घट जोयगी, तुम्हारी और सारी वानर सेना की शक्ति क्षीण हो जायेगी और राक्षसों को जीतना कठिन हो जायेगा !

माता सीताजी के वचन सुनकर हनुमानजी के दिल को बड़ा धक्का लगा, उसकी मानसिक व्यथा को जानकर माता सीताजी ने कहा – पुत्र हनुमान ! जिस समय दुष्ट रावण मुझे हर लाया था, उस समय तो में विवश थी पर इस समय तो मुझे यहां के असहनीय कष्टों पीड़ाओं से घबराकर या डरकर स्वेच्छा से तुम्हारे कंधों पर बैठकर चलना होगा, तुम्हारे शरीर का स्पर्श करना होगा, डरकर घबराकर, लोभ लालच में फंसकर या किसी भी प्रकार से मैं अपने पतिव्रत धर्म को छोड़ना या नाश करना नहीं चाहती ! मैं सब कुछ सहूंगी पर धर्म को नहीं छोडूंगी, पुत्र हनुमान ! तुम संशय में मत पड़ो । मैं अच्छी तरह से जानती हूं, तुम मेरे परम भक्त हो। मेरे पुत्र हो ! मुझे अपनी माता से बढ़कर मानते हो, मैं भी तुम्हें पुत्र के समान समझती हूँ ! तुम्हारी भक्ति से मैं अच्छी तरह से परिचित हूं। तुमने अपना सब कुछ भगवान श्रीरामजी के लिये अर्पण कर दिया है, मुझे खोजने के लिये तुमने अपने प्राणों की बाज़ी लगा दी है। तुम्हारे रोम रोम में राम सीता बस रहे हैं। यह सब मैं पतिव्रत धर्म के प्रताप में जानती हूं । इतने पर भी तुम पुरुष हो, यदि मोह वश स्वेच्छा से तुम्हारे शरीर का स्पर्श करूंगी तो मेरा धर्मनाश हो जायेगा। पुत्र हनुमान ! धर्म के सूक्ष्म तत्वों का समझना बड़ा कठिन है, तुम भ्रम में मत पड़ो ! अति शीघ्र जाकर श्रीरामजी को सब समाचार सुनाओ, अन्तर्यामी भगवान श्रीरामजी स्वयं यहां आकर मुझे ले जायेंगे।

माता सीताजी के वचन सुनकर हनुमान का संशय नाश हो गया, प्रसन्न होकर माताजी से आशीर्वाद लेकर तुरंत श्रीरामजी के पास जा पहुंचे!

विधेर्विष्णोर्हराद्वापि, पतिरेकोऽधिको मतः । पतिव्रतायां देवेशि, स्वपतिः शिव ए च !!

स्त्री के लिये ब्रह्मा, विष्णु और शंकर से भी बढ़कर अपना पति है, ऐसा मेरा निश्चित मत है। जिस नारी का शरीर, वाणी और मन अपने पति को छोड़कर और कहीं नहीं जाता, उस नारी को पतिव्रता समझना चाहिये ! पतिव्रता नारी के चरणों की धूलि से धरती पवित्र हो जाती है ! पतिव्रता को प्रणाम करने से सब पाप नाश हो जाते हैं !

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